Thursday, 2 May 2013

मैं कौन हूँ ?



मैं कौन हूँ ?
तुम मुझे जानोगे नहीं 
दुनियाँ  की भीड़ में 
तुम मुझे पहचानोगे नहीं ,
तुम्हारी नयन , तुम्हारी उपनयन 
तुम्हारी सूक्ष्म दर्शियाँ 
मुझे ढूंढते  ढूंढते थक जाएँगी 
पर तुम मुझे ढूंढ़  पाओगे  नहीं।


मैं सूक्ष्म हूँ ,
पर सूक्ष्म जगत में भी 
तुम मुझे देख पाओगे  नहीं।
मैं कभी अलौकिक , अनादि  अनंत ,
कभी भौतिक जीव हूँ 
ठीक तुम्हारी तरह, सजीव हूँ। 


आकाश ,अग्नि ,जल ,वायु का 
संगम  होता  है जब मृत्तिका से
 मेरा एक नया  भौतिक रूप उभर आता है,
तुम्हारी तरह एक नया जीवन का संचार होता है ,
नाम होता है सीता ,गीता ,समीम 
या कुछ और जैसे राम ,रहीम ,
या फिर पक्षी,पशु बृहद मातंग 
या सूक्ष्म रूप किट पतंग।
कभी बनस्पति ,विशाल वट वृक्ष 
पूजते हैं नर नारी मानकर नारायण।  
हर प्राणी, हर वनस्पति
सब है मेरी ही प्रकृति।
जान में हूँ ,बेजान में भी  हूँ।
जान पाए मेरा स्वरुप क्या तुम ?
क्या हूँ मैं? कौन हूँ मैं ?


मैं आकाश हूँ ,पर केवल आकाश नहीं ,
मैं अग्नि हूँ ,पर केवल अग्नि नहीं ,
मैं जल हूँ ,पर केवल जल नहीं ,
मैं वायु हूँ ,पर केवल वायु नहीं ,
मैं मिटटी हूँ , पर केवल मिटटी नहीं ,
मैं इनके समष्टि हूँ,
मैं भौतिक भी हूँ, और अलौकिक भी ,
तुम में 
मैं अन्तर्निहित शक्ति हूँ 
मुझे जानो ,मुझे पहचानो 
कौन हूँ मैं ?


रचना कालिपद "प्रसाद 
  सर्वाधिकार सुरक्षित 
 

30 comments:

  1. मैं भौतिक भी हूँ ,अलौकिक भी.....बहुत बेहतरीन रचना .

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  2. जान में हूँ, बेजान में भी ह‍ूँ .... गहनता लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति
    आभार

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  3. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 03-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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    1. आभार कुलदीप सिंह जी !

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  4. kamal ka likha hai apne.....anklan kar batana mushkil hai ki kaisa likha hai....umda

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  5. अन्तक को जानना ... आलोकिक शक्ति को पहचानना आसां तो नहीं होता ... पर जो इसे पाता है वो आत्मिक-सुख से भर जाता है ...

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  6. प्रकृति तत्व पर प्रकृति नहीं मैं।

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  7. बहुत ही बेहतरीन रचना की प्रस्तुति,आभार.

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (03-05-2013) के "चमकती थी ये आँखें" (चर्चा मंच-1233) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आभार डॉ शास्त्री जी

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  9. बहुत सुन्दर और सारगर्भित अभिव्यक्ति...

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  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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  11. बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  12. दर्शन से परिपूर्ण रचना

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  13. चैतन हूँ मै....... शाश्वत प्रश्न खडा करती रचना

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  14. मैं ही मैं हूँ बस जो भी हूँ .........बहुत सुन्दर

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  15. मैं कृष्ण हूँ .....

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  16. सिर्फ वो ही वो ...अनंत.....

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  17. किसने जाना मैं हूँ कौन ???
    सिर्फ ..मौन...मौन ,,मौन !

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  18. जीवन के सूक्ष्म को दर्शाती रचना
    वाकई आपकी लेखनी में एक दर्शन होता है
    बहुत ही सुंदर

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  19. अहम् ब्रह्माष्मी ****** आपने सम्पूर्ण श्रृष्टि को समेट लिया अद्भुत और अनूठा आनंद दायी ******

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  20. सुक्ष्म तत्व विवेचना करती सुंदर रचना.

    रामराम.

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  21. स्वयं को पहचानने का प्रयास सदैव करते रहना चाहिये.

    जीवन दर्शन पर अनुपम प्रस्तुति.

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  22. बहुत ही सुन्‍दर लेख
    हिन्‍दी तकनीकी क्षेत्र की रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारियॉ प्राप्‍त करने के लिये इसे एक बार अवश्‍य देखें,
    लेख पसंद आने पर टिप्‍प्‍णी द्वारा अपनी बहुमूल्‍य राय से अवगत करायें, अनुसरण कर सहयोग भी प्रदान करें
    MY BIG GUIDE

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  23. गहन भाव लिए सुंदर रचना

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  24. गहन भाव लिए रचना |
    आशा

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  25. मै समिष्ट हूँ सं भाव लिए , बहुत ही सुंदर वर्णन । बधाई काली पद जी ।

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