Thursday, 20 February 2014

किस्मत कहे या ........


गूगल से साभार



तीन पुत्र और दो कन्याओं के माता पिता

बूढ़े हो गए हैं ,लाठी के सहारे चलते हैं ,

सुबह शाम बड़ी बड़ी आखों में आंसू भरकर

दरवाज़े को अपलक ताकते रहते हैं l

हर सुबह उम्मीद का दीप अनुष्का जला जाती है

संध्या निर्दयता से उसे बुझा जाती है l

न कोई बेटा, न कोई बेटी को फुर्सत है

और न माँ बाप का खबर लेने कोई आते हैं l

पढ़कर बेटे गए कमाने विदेश

व्याहकर बेटियाँ गई साजन के देश l

सब हैं मस्त अपनी  अपनी जिंदगी में

अनोपयोगी वस्तु का क्या महत्व है जिंदगी में ?

बुढाबूढी समझते थे उनका जीवन सफल है

बच्चों को पढ़ा लिखाकर पैरों पर खड़ा किया है l

यही होंगे उनके बुढापे का सहारा

जब वे  होंगे शक्तिहीन बेसहारा l

इसे किस्मत कहे या दस्तूर नया जमाना

बूढ़े माँ बाप की तकलीफ किसी ने ना जाना l

जब होगये निर्बल ,न कर पाए श्रम

त्याग दिया मोह ,शरण लिया वृद्धाश्रम l 

 रचना : कालीपद "प्रसाद "
       सर्वाधिकार सुरक्षित

27 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (20-02-2014) को जन्म जन्म की जेल { चर्चा - 1529 } में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आपका आभार शास्त्री जी !

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  2. लोगों को सँभल जाना चाहिए ,बुढ़ापे के लिये अभी से प्रबंध करते चलें ,जिससे कि आत्म-निर्भर बने रहें और इतना मनोबल बना रहे कि अपना जीवन अपनी तरह से जी सकें .

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    1. लोग सोचते तो यही है परन्तु जब बच्चों की बात आती है तो हर माँ बाप उन पर सर्वस्व न्योछावर कर दे देता है !

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  3. अत्यंत मार्मिक रचना.

    रामाराम.

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  4. बढ़िया प्रस्तुति- -
    आभार आपका-

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  5. behad dukhad ....marmik prastuti

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  6. समय को दोष दें या परवरिश में मिले संस्कार के प्रतिदान को
    सादर

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  7. आजकल के बच्चों में अपने माता पिता के प्रति लगाव ही नहीं रहा ...!

    RECENT POST - आँसुओं की कीमत.

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  8. पुत्र पुत्रियों के होते हुये ऐसे रहना पड़े, तो दुर्भाग्य ही है।

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  9. राह तकती आँखों में सूनापन.....कई वृद्धों की यही कहानी
    अत्यंत दुःखद !

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  10. आभार आपका।

    हमारे वक्त का संत्रास अकेलापन लिए है यह रचना।

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  11. कटु यथार्थ की तिक्तता लिये मर्मस्पर्शी रचना ! ऐसी संतानों का होना ना होना बराबर है ! अत्यंत कष्टप्रद अनुभव है यह माता पिता के लिये !

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    1. टिप्पणी के लिए आभार आपका साधना जी !

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  12. कटु सत्य को व्यक्त करती रचना।

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  13. चारो लड़के गए दूर को , अम्मा को घर प्यारा है !
    सारे गॉँव की माताओं में,लगती निस्संतान वही हैं !

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    1. बिलकुल सही कहा आपने सतीश जी !

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  14. मार्मिक अभिव्यक्ति। जिनके पास पैसा है उनका जीवन भी कम कष्ट प्रद नहीं...

    रोटी पर बैठकर
    उड़ गये
    सभी लड़के

    कमरों में किरायेदार
    घर में
    बूढ़ा-बुढ़ी रहते हैं।

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    1. रोटी कमाने गए लड़के
      माँ बाप को किरायेदार के भरोसे छोडके !
      आभार !

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  15. ऐसी इच है दुनिया बोले तो .बढ़िया प्रस्तुति है सरजी मार्मिक मन को चेताती

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    1. सर जी टिप्पणी के लिए आभार !

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  16. आज का सच.. काश, समझ सकते सब..!!!

    मन को झकझोरती रचना!!

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  17. शानदार प्रस्तुति |
    आशा

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  18. now this is the reality of our society .

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