Thursday, 4 December 2014

ऐ भौंरें ! सूनो !

   

 

ऐ भौंरें ! सूनो , बाग़ की शान्ति न तुम  तोड़ो

स्वागत है तुम्हारा, फूलों से नेह-नाता जोड़ो||


कलियाँ तो कल का फूल है, कलिओं को ना छेड़ो

फूल बनकर सौरभ बिखरेगी ,फूलों को ना तोड़ो |


यौवन का सौरभ क्षणिक है ,यौवन नहीं ,फूल से प्यार करो

धन्य करो फूलों का जीवन ,डूबकर प्यार में मधु पान करो |

 

गुन गुनाकर झूमते हो , आकर्षित हो खिले फूलों की ओर

नज़र उठाकर नहीं देखते ,कल के मुरझाये फूलों की ओर |

 

मुरझाये फूलों के भी कुछ अरमान है ,उसका तो ख्याल करो 

झड जायगा यह फूल एकदिन ,जानकर उसका अनादर ना करो |


जीवन सबका क्षणिक है , इस बात को ना भुला करो 

प्रेम का विनिमय ही शाश्वत है ,इसपर मन स्थिर करो |



कालीपद "प्रसाद "

सर्वाधिकार सुरक्षित



8 comments:

  1. sarthak baat kahi apne.....sundar rachna

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  2. उम्दा रचना ..... खुबसूरत अभिव्यक्ति

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (05.12.2014) को "ज़रा-सी रौशनी" (चर्चा अंक-1818)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  4. आपका आभार राजेन्द्र कुमार जी !

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  5. उत्कृष्ट रचना..बेहद भावपूर्ण।

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  6. सुन्दर रचना !

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