Sunday, 22 February 2015

मैं भी ब्रह्माण्ड का महत्वपूर्ण अंग हूँ l

                  पृथ्वी नौ ग्रहों में से एक है ,अर्थात पृथ्वी के अलावा आठ और ग्रह  हैं l हर ग्रह के कुछ उपग्रह हैं जैसे पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा है l ये नौ ग्रह और उनके उपग्रहों के साथ सूर्य को मिलकर सौर्य मंडल बनता है l कहते हैं हर तारा एक सूर्य है और अन्तरिक्ष में अनंत तारे हैं l अत : अन्तरिक्ष में हमारे सौर्य  मंडल जैसे अनंत सौर्य मंडल  होंगे l इन सब सौर्य मंडलों को मिलाकर ब्रह्माण्ड बनता है lप्रश्न उठता है -कौन है इनता बड़ा ब्रह्माण्ड का निर्माता ? कौन  इस विश्व ब्रह्माण्ड को व्यावस्थित रूप से चला रहा है ? किसने किया है मनुष्य आदि प्राणियों की सृष्टि ? किसने किया है वनस्पतिओं की रचना ? इन असंख्य सौर्य मंडलों में किस सौर्य मंडल में वह रहता है ?क्या सभी सौर्य मंडलों में वह एक ही समय में उपस्थित रह सकता है ?सामान्य वुद्धि यही कहती है कि व्यक्ति के रूप में यह संभव नहीं है , हाँ शक्ति (उर्जा ) के रूप में रह सकता है l तो क्या ईश्वर निराकार अदृश्य शक्ति है ?
            आज तक कोई इसका पता नहीं लगा पाया कि ईश्वर का वास्तविक स्वरुप क्या है परन्तु हर धर्म के लोग यह मानते हैं कि कोई है जो इस विश्व ब्रह्माण्ड को नियंत्रित कर रहा है ! वह व्यक्ति है या शक्ति है -कुछ भी पता नहीं फिर भी मानते हैं "कोई है "l  कोई इन्हें भगवान कहते है ,कोई अल्लाह ,कोई गॉड ,आदि आदि ........l हरेक धर्म ईश्वर की अलग अलग स्वरुप की कल्पना की है l सबके अलग अलग विचार है l केवल एक ही विचार सब में सामान्य है वह है "कोई अदृश्य शक्ति या स्वरुप है जो इस विश्व ब्रह्माण्ड को नियंत्रित कर रखा है l"
             मुस्लिम धर्म में हज़रत मुहम्मद को  पैगम्बर और ईशाई धर्म में युशु मशीह को ईश्वर का दूत कहा गया है l यहाँ ईश्वर निर्विकार ,निराकार ,अदृश्य हैं किन्तु हिन्दू धर्म में ईश्वर को सगुण और निर्गुण दोनों माना है l कुछ लोग सगुण ईश्वर में विश्वास रखते हैं तो कुछ निर्गुण ईश्वर में l सगुण में विश्वास रखने वालों ने  राम ,कृष्ण को साक्षात विष्णु भगवान का अवतार माना है l यही नहीं, उनके अनुसार हिंदुयों के ३३ कोटि देव देवियाँ हैं जो समय समय पर धरती पर भिन्न भिन्न रूपों में अवतरित होते रहते हैं l निर्गुण में विश्वास रखने वालों के लिए ईश्वर एक हैं और निर्विकार, निराकार ,अदृश्य हैं l यही है अद्वैत वाद अर्थात ईश्वर एक ही है अनेक नहीं l कबीर दास अद्वैत बाद के प्रमुख उपासक थे l द्वैत बाद के हिन्दू द्विविधा में हैं ,किसकी पूजा करें और किसकी न करें l अनेक मतों में बंटे हुए हिन्दू जन भटके हुए पथिक जैसे हैं ,जो चौराहे पर तो खड़ा है परन्तु नहीं जानता कौनसा रास्ता उसे उसकी मंजिल तक ले जायेगा l ऊपर से पण्डे पुजारी उनको कर्म काण्ड के जाल में फंसाकर उलझन में दाल देते है lधर्म गुरु यहाँ अनेक है और सबका अलग अलग मत है l एक दुसरे को गलत साबित करने में तुले हुए हैं और अपने को सर्वश्रेष्ट कहलाने के लिए लालायित हैं l ऐसी स्थिति में बेचारी जनता करे तो क्या करे ? थक हारकर अपनी भलाई के लिए सब देवताओं कीं  पूजा करते हैं l लक्ष्मी ,काली ,दुर्गा ,सरस्वती ,शिव ,विष्णु, राम ,कृष्ण ,हनुमान ,साईं बाबा  आदि आदि ....l शायद इनमें  से कोई खुश हो जाय और उन्हें मोक्ष मिल जाय lअनेक देव देविओं की पूजा के चक्कर में किसी एक की भी पूजा पूर्ण भक्ति भाव से नहीं कर पाते l आस्था का झुला इधर से उधर झूलता रहता है l किसी एक पर स्थिर नहीं रहती l किन्तु आध्यात्मिक उत्कर्ष का माध्यम आस्था  ही है और वही स्थिर नहीं है तो आध्यात्मिक उत्कर्ष कैसे होगा ?ईश्वर कैसे मिलेगा ?  जैसे मकड़ी अनेक धागों से बनायीं अपने जाल में फंस जाती है ,मनुष्य भी अपनी अनेक आस्थाओं के जाल में फंस कर रह जाते हैं l अपनी लार से बनाई धागे के सहारे मकड़ी छत से झूल जाता है और फिर उसी धागे के सहारे ऊपर छत पर पहुँच जाता है l मनुष्य की आस्था यदि किसी एक पर अटूट हो तो वह उसी के सहारे ईश्वर तक पहंच सकता है l चाहे वह साईं हों या हनुमान हों ,राम हों या कृष्ण हों या फिर कोई और l ये सब तो आलंबन है इनके सहारे ईश्वर तक पहुंचना है l आस्था यदि कभी साईं ,कभी राम ,कभी कृष्ण ,कभी किसी और पर बारी बारी भटकती रही तो आस्थाओं का जाल बन जायगा ,मनुष्य उसी में उलझकर रह जायगा l इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि किसी एक पर पूर्ण आस्था रखे और उसी की पूजा पूरी आस्था के साथ करे l सभी रूप ईश्वर के हैं इसीलिए सब में श्रद्धा रखे पर पूजा एक ही रूप का करे lनिश्चित रूप में आध्यात्मिक उन्नति होगी l रत्नाकर दस्यु ने मरा-मरा जप कर अपने पापों का प्रायश्चित कर आदि कवि महामुनि वाल्मीकि बने l मरा-मरा अर्थात 'राम' उसका आलंबन था l हर इन्सान को भी परमेश्वर की प्राप्ति के लिए किसी एक को आलंबन बनाना पड़ता है l एक पर ही आस्था (भक्ति )दृढ और अटूट होती है l जहाँ आलंबन अनेक हों वहाँ आस्था (भक्ति ) कमजोर पड़  जाती है l अटूट आस्था (मानसिक रूप में सशक्त ) वालों को आलंबन की जरुरत नहीं होती परन्तु अनेक आस्था रखनेवालों को आलंबन की आवश्यकता होती है l मूर्ती पूजा का आधार यही है l  ईश्वर निर्विकार ,निराकार है ,परन्तु सब लोग इस बात पर अपनी आस्था स्थित नहीं कर सकते इसीलिए ईश्वर का साकार रूप की कल्पना की गई है l जो निराकार में अपनी आस्था केन्द्रित नहीं कर सकते ,उनके लिए साकार मूर्ती सहायक है l ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश की कल्पना ..आदि कल्पना है l बाद में राम, कृष्ण को  विष्णु काअवतार मानकर उनकी पूजा की गई है l लेकिन ये सब तो आलंबन है l मंजिल तो ईश्वर हैं l ईश्वर अनन्त हैं ,अदृश्य है ,सर्वव्यापी है l सबको सोचना चाहिए --इस ब्रह्माण्ड को ईश्वर ने रचा है l मैं इस ब्रह्माण्ड का हिस्सा हूँ l मुझे गर्व है कि मैं एक ईश्वरीय अभिव्यक्ति हूँ l मुझे ईश्वरीय हर अभिव्यक्ति से प्यार है l हर प्राणी ईश्वरीय अभिव्यक्ति है ,प्रकृति में हर वस्तु ईश्वरीय अभिव्यक्ति है l हर अभिव्यक्ति का एक उद्देश्य है l हम उनसब उद्येश्यों को समझ नहीं पाते l हमें सतत प्रयत्न करना चाहिए उन उद्येशों को जानने के लिए l उसके लिए हमें केवल एक आलंबन का चयन करना पड़ेगा l रचना के सहारे रचनाकार तक पंहुचना पड़ेगा l

कालीपद "प्रसाद"
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11 comments:

  1. बहुत सुन्दर लेख। हम सभी इस ब्रह्माण्ड का हिस्सा ही तो हैं। क्या फर्क पड़ता है की पृथ्वी के किस कोने पर रहते हैं।

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  2. मंजिल तो ईश्वर' है. सार्गार्भ्त लेख. बधाई है.

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  3. सार्थक प्रस्तुति।
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (24-02-2015) को "इस आजादी से तो गुलामी ही अच्छी थी" (चर्चा अंक-1899) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आपका आभार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी !

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  4. बहुत अच्‍छा आर्टकल प्रस्‍तुत किया है आपने,धन्‍यवाद।

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  5. इश्वर के अंश हैं सभी और सभी को उस महा इश्वर में समाना है ...

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