Thursday, 3 September 2015

जिन्दगी और रेलगाड़ी







जिन्दगी और
रेलगाड़ी...
दोनों एक जैसी हैं |
कभी तेज तो कभी
धीमी गति से
लेकिन चलती है |
पैसेंजर ट्रेन...
स्टेशन पर रुक जाती है
और देर तक रुकी रहती है |
जिन्दगी के कुछ लम्हे
ऐसे भी होते है
जिसमे आकर
जिन्दगी रुकी प्रतीत होती है |
लाख कोशिश करे
जिन्दगी आगे नहीं बढती
लगता है तब
आखरी स्टेशन आ गया है |
जिन्दगी में न जाने
कितनों से मिले,
किन्तु कुछ ही की यादें
यादों में बस गए,
कुछ की यादें
पैसेंजर की भांति
यादों से उतर गए |
रेलगाड़ी और जिन्दगी में
एक ही अंतर है,
गाड़ी आखरी स्टेशन से
लौटकर पहले के
स्टेशन में आ जाती है,
किन्तु जिन्दगी की गाडी
लौटकर कभी भी
बचपन में नहीं आती है |

© कालीपद ‘प्रसाद’ 

7 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 04 सितम्बर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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    1. आपका आभार यशोदा अग्रवाल जी !

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04.09.2015) को "अनेकता में एकता"(चर्चा अंक-2088) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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    1. आपका आभार राजेंद्र कुमार जी !

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  3. बहुत खूब ... जिंदगी सच मिएँ एक रेल है एक ही सीधा में दौड़ने वाली ...

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  4. वास्तव में ज़िंदगी एक रेल ही है जो कभी लौट कर पिछले स्टेशन पर नहीं आती...बहुत सुन्दर

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  5. सुन्दर रचना...

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