Sunday, 4 October 2015

गाँधी जी !

                             
नीति और कार्य द्वारा  सबसे गरीब का भला हो
भारत के शासक और शासन नीति का यही ध्येय हो
सभी नेताओं से यही कहा था राष्ट्रपिता गाँधी जी ने
सबके तन पर कपडे, सरपर छत हो, कोई भूखा न हो |

सर्वस्य त्याग कर एक वस्त्र धारी बने थे गांघी जी
अहिंसा,प्रेम और सौहाद्र के लिए लडे थे गाँधी जी
स्वर्ग से ईच्छा हुई देखे कैसा है स्वतंत्र भारत आज
भ्रष्टाचारियों के हाथ अहिंसा का  क़त्ल देख रो दिए गांधी जी |



कालीपद 'प्रसाद'

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (05-10-2015) को "ममता के बदलते अर्थ" (चर्चा अंक-2119) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आपका आभार शास्त्री जी !

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  2. भ्रष्टाचारियों के हाथों अहिंसा का क़त्ल तो होना ही था.

    सुंदर रचना.

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