Thursday, 27 April 2017

ग़ज़ल

वो अश्क भरा चश्म, समुन्दर न हुआ था
उस दीद से’ दिल भर गया’, पर तर न हुआ था |
तू दोस्त बना मेरा’ चुराकर न हुआ था
संसार कहे कुछ भी’ सितमगर न हुआ था |
वर्षों से’ नहीं हम मिले’, यह एक फसाना
खिंचाव कभी कुछ कहीं’, जर्जर न हुआ था |
हर बार नयन से गिरे’ आँसू, मिले’ जब हम
वो अश्रु हमारा कभी’, गौहर न हुआ था |
दुनिया ने’ किया ज़ुल्म, निखारा सभी’ सद गुण
हम भी बने’ मज़बूत, सिकंदर न हुआ था |
वो गर्म निगाहें तेरी’, कहती थी’ फ़साने
 शोला जगा’ जब दिल में’ तो’ अवसर न हुआ था |
वो सुरमई’ आखें बड़ी’, औ गाल में’ कृष तिल
सब याद है’ मुझको, कभी’ कमतर न हुआ था |
गौहर –मोती
कालीपद ‘प्रसाद’

Thursday, 6 April 2017

ग़ज़ल


बिन तेरे जिंदगी में’ पहरेदार भी नहीं
दुनिया में’ अब किसी से’ मुझे प्यार भी नहीं |

बेइश्क जिंदगी नहीं’ आसान है यहाँ  
इस मर्ज़ की दवा मिले’ आसार भी नहीं |

कटती नहीं निशा ते’रे’ दीदार के बिना
दीदार और का कभी’ स्वीकार भी नहीं |

अब काटना है उम्र ख़ुशी हो या’ गम सनम
तू याद में बसेगी’ तो’ दुश्वार भी नहीं |

अनजान देश में कभी’ तुम यदि उदास हो
सन्देश किस तरह मिले’ अखबार भी नहीं |

दीवानगी 'प्रसाद' पे’ वहशत की हद हुई
अब वेदना का’ को’ई’ भी आजार भी नहीं |

दिल से अगर कभी कभी’ मिलता नहीं है’ दिल
समझौता’ मायने नहीं’ तकरार भी नहीं |

इनकी कला बखान करूँ क्या खुदा बता
लड़ते हैं’ और हाथ में’ तलवार भी नहीं |( गिरह )

शब्दार्थ
दुश्वार –मुश्किल ;  आजार – दुःख/दर्द का स्वाद
वहशत – पागलपन /भय

कालीपद ‘प्रसाद’
  

Wednesday, 5 April 2017

ग़ज़ल

तेरी’ उल्फत नहीं’ नफ़रत ही’ सही
गर इनायत नहीं, जुल्मत ही’ सही |
चाहा’ था मैं तेरी संगत ही मिले
तेरी’ संगत नहीं, फुरकत ही’ सही |
इश्क तुमसे किया’, गफलत हो’ गई
छोड़ सब ख्याति, हकारत ही’ सही |
नाम तो सब हुआ’, बदनाम अभी
मेरी’ वहशत तेरी शोहरत ही’ सही | (गिरह)
पास आना कभी’ होगा नहीं’ किन्तु
मेहरबानी दे ज़ियारत ही’ सही |
जीस्त लम्बी नहीं छोटी है यहाँ
अब इसे मान शिकायत ही’ सही |
ये कहावत तो’ सही है जानम
गर असल है नहीं’ हसरत ही’ सही |
शब्दार्थ :
जुल्मत =अनुदार, अन्धेरा
फुरकत = विरह, वियोग
गफलत =भूल
हकारत=तिरस्कार ,अपमान
वहशत =भय ,पागलपन
ज़ियारत =दर्शन,दीदार
हसरत = अभिलाषा, इच्छा, कल्पना 

 कालीपद ‘प्रसाद’

Thursday, 30 March 2017

नवरात्रि दुर्गा स्तुति

नवरात्रि दुर्गा स्तुति
१,
जयति जय दुर्गे, दुर्गति नाशिनी माँ
जयति वरदायिनी, कष्ट हारिणी माँ |
है तू शिवप्रिये गणमाता, तू कल्याणी माँ
शुभ्र-हिमवासी, गिरि पुत्री, पार्वती माँ |
रत्नालान्कार भूषिता, त्रिपुर सुंदरी माँ
संकट मोचनी, महिषासुर मर्दिनी माँ |
आयुध धारिणी, सब शत्रु नाशिनी माँ
जयति जय दुर्गे, दुर्गति नाशिनी माँ|
२.
तू ही विद्या, तू ही लक्ष्मी, तू ही है माँ शक्ति
तू ही वुद्धि, क्षुधा, तृष्णा, तू ही श्रद्धा भक्ति |
तू ही निद्रा, तू ही शांति, तू ही बोध ज्ञान
माता रुप में रखती तू, बच्चों का ध्यान |
तू ही स्मृति, तू ही भ्रान्ति, तू है मोह माया
सूक्ष्म रूप में तू व्याप्त, विश्व तेरी छाया |
विद्या वुद्धि हीन मैं, तू विद्या, तू है उमा
वर दे अकिंचन को, तू दयामयी माँ |
कालीपद ‘प्रसाद

Saturday, 25 March 2017

ग़ज़ल

ईंट गारों से’ बना घर को’ मकां कहते है
प्यार जब बिकने’ लगे, दिल को’ दुकां कहते हैं |
क्या पता क्या हुआ’ दिनरात जले दिल मेरा
प्यार में गुल्म१ को’ तो लोग नशा कहते हैं |
फलसफा जीस्त की, तकलीफ़ न देना औरों को’
गफलतों में’ गिरा इंसान बुरा कहते हैं |
आचरण नेता’ का’ विश्वास के’ लायक ही’ नहीं
इसलिए लोग उन्हें इर्स२ झूठा कहते हैं |
जब तलक आस बनी रहती’ खिली’ रहती जीस्त
आसरा टूटने’ को लोग क़ज़ा कहते हैं |
शब्दार्थ : १ गुल्म –सोहबत के लिए बेकरार होना
२ इर्स –गुण या काम पीढ़ी दर पीढ़ी चलना
(खानदानी)
कालीपद ‘प्रसाद’

Sunday, 12 March 2017

व्यंग



दोहे (व्यंग )
हमको बोला था गधा, देखो अब परिणाम |
दुलत्ती तुमको अब पड़ी, सच हुआ रामनाम||
चिल्लाते थे सब गधे, खड़ी हुई अब खाट|
गदहा अब गर्धभ हुए, गर्धभ का है ठाट ||
हाथ काट कर रख दिया, कटा करी का पैर |
बाइसिकिल टूटी पड़ी, किसी को नहीं खैर ||
पाँच साल तक मौज की, कहाँ याद थी आम |
एक एक पल कीमती, तरसते थे अवाम ||
करना अब कुछ साल तक, बेचैन इन्तिज़ार |
खाकर मोटे हो गए , घटाओ ज़रा भार ||
*****
होली पर एक दोहा
*************
होली फागुन पर्व है, खेलो रंग गुलाल |
हार जीत है जिंदगी, रखना दूर मलाल ||
© कालीपद ‘प्रसाद’

Saturday, 11 March 2017

होली

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ |
*******************************
आया रंगीला फागुन, लेकर फाग दुबारा
दिल के धड़कने देख, दिलवर को पुकारा |
जहां राधा वहीँ कृष्ण, वहीँ आनन्द वहीँ प्रेम
मथुरा वहीँ, बृज वहीँ, बरसाने वहीँ क्षेम |
ढाक ढोल मृदंग बाजे , नाचे ग्वाल नंदलाल
रंगों का ये इन्द्रधनुष, नभ में उड़े रे गुलाल |
श्रीराधा है प्रेममयी, कृष्ण रूप है प्रेममय
आनंद प्रेम रस कृष्ण, विलीन है सृष्ठिमय |
सारा जगत कृष्णमय, कृष्ण है जगत प्राण
राधा राधा जपे कृष्ण, श्रीराधा है कृष्ण प्राण |
फाल्गुन पूर्णिमा रात्रि, दुधिया चाँदनी कुँवारी
महा रास नृत्य में मस्त, राधा संग मुरारी |


© कालीपद ‘प्रसाद’

Tuesday, 7 March 2017

ग़ज़ल

छुपे जो देशद्रोही, वीर उनकी जान लेते हैं
हमारे देश ऐसे वीर से ,बलिदान लेते हैं |
छुपाते रहते खुद को त्रास में, आतंकवादी सब
करे कोशिश जो भी, सैनिक उन्हें पहचान लेते हैं |
जो करते देश से दृढ़ प्रेम, वो हैं देश के सैनिक
निछावर प्राण करते खुद, नहीं अहसान लेते हैं |
पडोसी हैं छुपा विश्वासघाती, छली हैं वे
 वो ठग गद्दार पीछे से कटारें तान लेते हैं |
अनैतिक है डराना, जुल्म करना निर्बलों पर नित्य
डरा कमज़ोर को सब व्होट तो, बलवान लेते हैं |
सुहानी जिंदगी जीना सदा, आसान मत समझो
मुसीबत में फँसाकर इम्तिहां, भगवान लेते हैं |
महत्ता दान की बढती, मिटे गर मुफलिसों की भूख
भिखारी हाथ खाली है, पुजारी दान लेते है |
@ कालीपद ‘प्रसाद’

Monday, 6 March 2017

ग़ज़ल

हर अजीमत से मेरा ज़ज्ब जवां होता है
देखता हूँ मैं कभी दर्द कहाँ होता है |

बिन कहे जिसने किया जीस्त के सब संकट नाश
नाम उसका खुदा रहमत है या माँ होता है |

हाट जिसमें बिके जन्नत की टिकिट धरती पर
नाम उसका यहाँ धर्मों की दुकां होता है |

लोग ऐसे नहीं बदनाम किसी को करते
आग लगती है तो हर ओर धुआं होता है |

जो भी आया यहाँ सबकी मिटी है हस्तियाँ
जिसने कुछ काम किया उसका निशाँ होता है |

आपसी प्यार से ही लोग जुड़े आपस में
बिन मुहब्बत के तो घर एक मकां होता है |

हैं चतुर नेता सभी, काम बताते कुछ भी
हर कदम में कोई इक राज़ निहां होता है |

जज अदालत भले फटकार लगाए उनको
रहनुमा को किसी से शर्म कहाँ होता है |

अब पढ़ाई हो गई ख़त्म सियासत आरम्भ
आज का देख ये हालात गुमां होता है |

शब्दार्थ : अजीमत =संकल्प ,निश्चय
ज़ज्ब = कशिश ,मोह , लगाव 


कालीपद ‘प्रसाद’ 

Friday, 3 March 2017

ग़ज़ल

गीतिका
*********
बेवफा रिश्ते निभाने आ गया
आज मुझको आजमाने आ गया |

भूला बिसरा गीत यादों में बसा
दोस्त उसको गुनगुनाने आ गया |

कौन है जो यूँ ही दिल में आ बसा
अजनबी है बेठिकाने आ गया |
आज सुनलो बात मेरी बावफा
मैं तुहारे ही निशाने आ गया |

दिल में जो थी तिक्तता वर्षों दबी
द्वेष कड़वाहट सुनाने आगया |

याद कर फ़रियाद सब वो भूत का
शर्त पर मुझको झुकाने आ गया |

भूलकर अपमान जो झेला कभी
वो बडप्पन अब जताने आ गया |

क्या हुआ अद्भुत , बजा क्या झुनझुना
आज वो हमको मनाने आ गया |

हारा है हरबार जब भी वह लड़ा
अब सबक हमको सिखाने आ गया |



कालीपद ‘प्रसाद’

गीतिका

आजादी तुम्हे जो मिली उसको न गँवाना
जो तोड़ने की बात करे उसको मनाना |
काश्मीर से दक्षिण कभी कोई न अजाना
मिलकर सभी इस देश में अब जश्न मनाना |
कुछ लोग हवा देते विभाजन बटवारा
होली या बिहू, तुम सभी त्यौहार मनाना |
अरुणाचल से कच्छ तलक भारत अपना
अफ़साने शहीदों की सुना शोक मनाना |
ए देश हमारा है, तुम्हारा है, यही सच
इसकी खुशहाली सदा मिलकर ही मनाना |
@ कालीपद ‘प्रसाद’

Thursday, 2 March 2017

गीतिका

कहीं धमकियां तो कहीं गालियाँ
चरम पर चली बेरहम गोलियाँ |
चुनावी लड़ाई की ये आँधियाँ
मिटाती शराफत की पाबंदियाँ |
सियासत में ईमान बिकता रहा
सरे आम लगती रही बोलियाँ |
जो जीता वही बन गया बादशाह
जो हारे सभी को लगी हिचकियाँ |
निभाता नहीं वायदा रहनुमा
उजाड़ा महल के लिए बस्तियाँ |
सफाई की बातें वे करते रहे
शहर बीच बहती रही नालियाँ |
© कालीपद ‘प्रसाद’

Sunday, 5 February 2017

एक ग़ज़ल

इस जीस्त से निराश हूँ मैं, यार क्या करूँ
कुछ भी तो सूझता है नहीं, प्यार क्या करूँ |
हमको निभाना प्यार तो, इकरार क्या करूँ
उत्सर्ग जिंदगी है तो, इज़हार क्या करूँ |
ये जीस्त भी अजीब है, इज्ज़त मिली नहीं
खाया हूँ डांट,चोट, तिरस्कार, क्या करूँ |
हर बात दोस्त मानता, जोरू जो बोलती
इस भीरु दोस्त से मैं क्या तकरार करूँ |
माँगे बिना मिला नहीं कुछ भी यहाँ कभी
ये प्यार जो तुम्हारा है, इनकार क्या करूँ |
है नाव जिंदगी का रहा तैरता मगर
कश्ती तो डगमगा रही मझधार, क्या करूँ |
यह तोहफा अनूठा है, थोड़ा डरावना
लड़ना तो जानता नहीं, तलवार क्या करूँ |
आना है हमको और यहाँ, रहना नहीं कभी
जग-हाट में दुकान का विस्तार क्या करूँ |
खोटा  नसीब है मेरा , अब क्या कहूँ तुझे
पाना तुझे तमन्ना थी, उपहार क्या करूँ |
जब फ़र्ज़  ही नसीब है, अधिकार तो नहीं
यह जिंदगी तुम्हारी है, उपकार क्या करूँ ||
© कालीपद’प्रसाद’
***

Tuesday, 31 January 2017

हे राम जी ! सुनो

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एक बार फिर राम जी,तारो नैया पार |
यू पी में सरकार हो, मंदिर हो तैयार ||
झूठ नहीं हम बोलते, पार्टीहै मजबूर |
हमें करो विजयी अगर,बाधा होगी दूर ||
जाति धर्म सब कट गया, वजह सुप्रीम कोर्ट|
आधार कुछ बचा नहीं, कैसे मांगे वोट ||
तुम ही हो मातापिता, बंधू भ्राता यार |
साम दाम या भेद हो,ले जाओ उस पार ||
मंदिर ज़िंदा जीत है, मृत मुद्दा है हार |
राम राम जपते रहो,होगा बेड़ा पार ||
© कालीपद ‘प्रसाद’

Saturday, 28 January 2017

ग़ज़ल

सादगी है भली जिंदगी के लिये
तीरगी फैली है रौशनी के लिये ।
बेवफाई नही पत्नियों से कभी
फायदा है वफा, आदमी के लिये ।
क्या कहूँ क्या लिखूँ सब रहा अनकहा
शब्द पूरा नही शायरी के लिये ।
चाह है कोइ भी काम हो खुद करूँ
ज्ञान तो है नही नौकरी के लिये ।
मुस्कुराना पड़ा, खिल्खिलाना पड़ा
ए सभी खोखला दिल्लगी के लिये ।
वोट पाये सभी, मुफ्लिसो से सदा
कुछ करो फायदा, मुफ्लिसी के लिये ।
© कालीपद ‘प्रसाद

Saturday, 21 January 2017

ग़ज़ल





नंदन प्यारा था दुलारा था, सहारा न हुआ
मेरा खुद का ही जलाया दिया अपना न हुआ |

रौशनी फ़ैल गयी चारो तरफ लेकिन फिर
घर अँधेरा था अँधेरा है उजाला न हुआ |

देखते रह गए बेसुध नसे में मदिरा बिना  
चाह कर भी उन्हें फ़रियाद सुनाना न हुआ |

दिल नहीं तुझको दिखा सकता जलाया तू ने
ख़ाक में मिल गया वो छार किसी का न हुआ |

निकले थे वज्म से बेआबरू होकर कभी वो
बेरुखी तेरी वजह थी कि दिवाना न हुआ |

सिर्फ मैं ही नहीं, हर एक दिवाना जो बना    
दर्द तुमने दिया उसको तो भुलाना न हुआ |

याद करते थे सभी तुझको, दुलारी थी तू
दिल का अरमान हमारा कभी पूरा न हुआ |

कालीपद ‘प्रसाद’

Friday, 13 January 2017

ग़ज़ल




हमने जब वादा किया तो मुस्कुरा देने लगे
दोस्ती में वो मुझे इक तोहफा देने लगे |

इस जमाने के दिए झटके सभी हमने सहा
जख्म जो तुमने दिया था, बेदना देने लगे |

कार बस के काफिले से ध्वस्त यातायात जब
बंद रस्ते खोल रक्षी रास्ता देने लगे |

हादसा के पीडितों ने तो गँवाया जान खुद
फायदा क्या प्रतिकरण जो दूगुना देने लगे |
 
शत्रु है दिनमान सबके, जुगनू हो या चिराग
शुर्मयी निशि को चिरागें जगमगा देने लगे |

दोस्ती अच्छी अगर है तो ज़माना आपका
मैं हुआ बेचैन यारा हौसला देने लगे  |


कालीपद ‘प्रसाद’

Friday, 6 January 2017

ग़ज़ल

काले बादल से हवा में भी नमी लगती है |
दिल के रोने से ये आँखे भी गिली लगती है ||

रजनी के आँसू से धरती ने बुझाया है प्यास|
पाँव रखता हूँ तो हलकी सी नमी लगती है||

यह सियासत भी बड़ी बेवफा है, हरदम धूर्त |
ना पिता की हुयी ना पति की,कटी लगती है ||

इस तन्हाई में तेरी याद हमेशा आई |
क्या करूँ मैं ये फिजायें भी लुटी लगती है ||

दीप की रोशनी से धरती चमकती है जब |
धरती की साडी तो हीरे ही जड़ी लगती है  ||

ढक गई है धरा पत्तों की हरी चादर से |
रूप में वह नई दुल्हन से भली लगती है ||


© कालीपद ‘प्रसाद’

Thursday, 5 January 2017

ग़ज़ल

खुशबू नहीं शबाब नहीं अब गुलाब में
कैसे कहूँ कशिश भी नहीं अब शराब में |
काली घटा गरफ्त किया सूर्य रौशनी
वो तीक्ष्णता चुभन भी नहीं आबताब में |
जीवन कभी सुसाध्य नहीं, इक रहस्य है
इंसान मोह में सदा जीते सराब में |
बचपन यहीं कहीं खो गया, ढूंढने लगा
मैंदान में नहीं, मिला उसकी किताब में |
यदि कर्म पूजा है तो अलग पूजा क्या करे
होनी विलीन आदमी के ही सवाब में |
कितने सफ़ेद कितनी है काली मुद्रा चलन
अब कौन है यहाँ जो कहेगा हिसाब में |
नेता कहे भी तो कहे क्या जनता को पत|
श्रद्धया नहीं किसी को भी झूठे जवाब में |
शबाब-लालिमा ; सराब -मृगमरीचिका
सवाब -पूण्य कर्म
कालीपद ‘प्रसाद’

Tuesday, 3 January 2017

फल -महिमा -दोहे

मधुर आम उपवन उपज, करते सब रस पान |
तिक्त करेला कटु बहुत, करता रोग निदान ||
काला जामुन है सरस, मत समझो बेकार |
दूर भगाता मर्ज सब, पेट का सब बिकार ||
पपीता बहुत काम का, कच्चा खाने योग्य |
पक्का खाओ प्रति दिवस, है यह पाचक भोज्य ||
खट्टा मीठा रस भरा, अच्छा है अंगूर |
खाओ संभल के इसे, अम्ल कारी प्रचूर ||
मीठा होता सन्तरा, ज्यों अंगूर-शराब |
रस इसका खुल पीजिये, पाचन अगर ख़राब ||
कलिन्दा सभी मानते, उपज ग्रीष्मकालीन |
खाता हरेक चाव से, मुहताज या कुलीन ||
छाल इस पर हराभरा, अन्दर पूरा लाल |
रस पीओ ठण्डा करो, जैसा हो अनुकाल ||
रोगी सभी प्रकार के, करे सेवन अनार |
आंव,कब्ज कै दस्त भी, होता दूर विकार ||
द्रव्य पचाने में निपुण, गुणवान अनन्नास |
करता बाहर अम्लता, ऐसा है विश्वास ||
कदली खाओ प्रेम से, पर भोजन के बाद |
रिक्त पेट कदली सदा, करत काय बरबाद ||


@कालीपद ‘प्रसाद’