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Thursday, 27 February 2020

कविता -दिल्ली क्यों जला रहा है ?

दिल्ली क्यों जल रहा है ? छुपके चुपके खामोश षड़यंत्र रचा जा रहां है, तिल-तिल आहत संविधान हिंसा द्वेष से प्रजातंत्र जल रहा है | प्रजा हित प्रमुख है या शासक का दम्भ ? यही ला रहा है धीरे से शांत समाज में भूकंप | शासन के लिए बहुमत अवश्य जरुरी है, सुशासन के लिए सशक्त विपक्ष भी जरुरी है | विपक्ष ही निरंकुश, झक्की शासक का अंकुश है, भोली-भाली जनता को आगे इसको समझना है | हर घर का एक वोट पक्ष में दुसरा वोट पड़े विपक्ष में, तभी प्रजा की हित होगी देश रहेगा सलामत में | निरंकुशता का फल आपातकाल या तानाशाही, भारत भुगत चुका आपातकाल और एकल राजशाही | धर्म, जाति, वर्ण के आढ़ में और खेल न खेलो, बदल गया है युग, यह कलि सच्चा विकास करो, देश संभालो | कालीपद 'प्रसाद'

Thursday, 13 September 2018

कविता

मात्रा १६,१५,=३१ , अंत २१२ 
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मीठी मीठी हिंदी बोलें, जन मानस को मोहित करे
सहज सरल भाषा हिंदी से, हम सबको संबोधित करे |
रंग विरंगे फूल यहाँ है, यह गुलदस्ता है देश का
हिंदी के सुगंध फैलाकर, भारती को सुगन्धित करे |
गलती होगी सोचो मत यह, बोलो बेधड़क होकर तुम
गलती करे अहिन्दी भाषी, गलती को संशोधित करे |
भिन्न भिन्न भाषा अनेक, उत्तर दक्षिण ,पश्चिम पूर्व
हिंदी का प्रचार प्रसार हो, सभी को प्रोत्साहित करे |
पूजा चाहे कोई भी हो, काली दुर्गा शंकर विष्णु
हिंदी में सब मंत्र पढ़ें औ, फूल अर्घ सब अर्पित करे |
घर हो या दफ्तर या होटल, हिंदी में ही सब बात करे
आपसी बात हिंदी में ही, अपना विचार प्रेषित करे |
कालीपद ‘प्रसाद’

Monday, 3 September 2018

जागो उठो !


सुनो सुनो सब बच्चे प्यारे, यही अनसुनी एक कहानी
किस्सा है भारत वासी का, कुछ लोगों की नादानी |
फूट डालो और राज करो, यही नीति किसने अपनाई 
जात-पात, भेदभाव सबको, यही नीति ने भारत लाई |
अंग्रेज चतुर थे,तुरंत भाँपा, इनमें कितने कौन बुराई
एक-एक कर चुनचुन सारे, जिनकी नीति उन पर चलाई |
समाज बट गया वर्ग में जब, दो भाई में दरार आई
मर्म से मर्म की दूरी बढ़ी, ऊँच नीच खाई गहराई |
जाति,वर्ण,वर्ग,सभी दुश्मन, गुप्त रूप से रंग दिखाया
एक को दिया चैन की नींद, दूजे का सुख चैन चुराया |
अंग्रेज नहीं बदलाव किया, भारत की वो प्राचीन नीति
उससे फायदा उन्हें भी था, अपनाया दमनकारी नीति |
भारत है अब आजाद मुल्क, नीति मुल्क की है संविधान
इसकी तुम अब करना रक्षा, करना इसका सदा सम्मान |
यही दिलाया मान मर्यादा, हमारा किया मस्तक ऊंचा
सुरक्षित रहेगा संविधान, सर न किसी का होगा नीचा |
छेड़छाड़ इस संविधान से, कभी न तुम अब करने देना
यही तुम्हारी त्राण कवच है, इसकी रक्षा में सिर देना |
जान जाय कोई बात नहीं, संविधान की रक्षा करना
इसकी रक्षा में तन मन धन, अपना सभी कुछ लुटा देना |
सरहद पर सैनिक डटे हुए, रक्षा करते आक्रमणों से
चौकन्ना तुमको भी रहना, अंदर के सभी दुश्मनों से |
चुपके चुपके छुपकर करते, जयचंदों की उनकी टोली
खुद के घर को जलाकर कभी, खुशी खुशी खेली है होली |
वंचित,शोषित,पीड़ित जन सब, उठो खड़े हो अपने दम पर
आत्मविश्वास जगाओ अभी, हो जाओ तुम खुद पर निर्भर |
अधिकार नहीं मिला किसी को, हाथ जोड़कर माँगो न कभी
ताकतवर शक्ति छीन लेते, तुम भी छीनो झुकना न कभी |
यह देश है तुम्हारा, मालिक तुम्ही हो इस हिंदुस्तान के
दुश्मनों को भी रखना पास, अपने प्यार में कैद करके |
कालीपद 'प्रसाद'

Saturday, 11 March 2017

होली

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ |
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आया रंगीला फागुन, लेकर फाग दुबारा
दिल के धड़कने देख, दिलवर को पुकारा |
जहां राधा वहीँ कृष्ण, वहीँ आनन्द वहीँ प्रेम
मथुरा वहीँ, बृज वहीँ, बरसाने वहीँ क्षेम |
ढाक ढोल मृदंग बाजे , नाचे ग्वाल नंदलाल
रंगों का ये इन्द्रधनुष, नभ में उड़े रे गुलाल |
श्रीराधा है प्रेममयी, कृष्ण रूप है प्रेममय
आनंद प्रेम रस कृष्ण, विलीन है सृष्ठिमय |
सारा जगत कृष्णमय, कृष्ण है जगत प्राण
राधा राधा जपे कृष्ण, श्रीराधा है कृष्ण प्राण |
फाल्गुन पूर्णिमा रात्रि, दुधिया चाँदनी कुँवारी
महा रास नृत्य में मस्त, राधा संग मुरारी |


© कालीपद ‘प्रसाद’