Thursday, 7 December 2017

ग़ज़ल

किसी को’ भी’ नेता पे’ एतिकाद नहीं
प्रयास में असफल लोग नामुराद नहीं |

किये तमाम मनोहर करार, सब गए भूल
चुनाव बाद, वचन रहनुमा को’ याद नहीं |

गरीब सब हुए’ मुहताज़, रहनुमा लखपति
कहा जनाब ने’ सिद्धांत अर्थवाद नहीं |

जिहाद हो या’ को’ई और, कत्ल धर्म के’ नाम
मतान्ध लोग समझते हैं’, उग्रवाद नहीं  |

कृषक सभी है’ दुखी दीन, गाँव में बसते
वो’ घोषणाएँ’ भलाई की’, ग्राम्यवाद नहीं |

हरेक धर्म में’ कुछ बात काबिले तारीफ़
को’ई भी’ धर्म कभी होता’ शुन्यवाद नहीं |

को’ई भी’ बात में’ विश्वास जो करे बिना’सोच
इसे कहे सभी’ धर्मान्ध, वुद्धिवाद नहीं  |

करे यकीन सभी वाद में, सही हैं’ सभी
विवेक पर करे’ विश्वास, भूतवाद नहीं|

सभी चुनाव सभा में बवाल हो जाते
कि धर्म जलसा’ में’ कुछ फ़ित्ना’-ओ-फसाद नहीं |

 शब्दार्थ अर्थवाद= पूंजीवाद    
 ग्राम्यवाद-गाँव/गाँववासी की बराबर उन्नति के कार्य   
शुन्यवाद=जिसमे ज्ञान और सत्य का कोई मूल और
वास्तविक आधार न हो |

भूतवाद=भौतिकवाद 
कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 6 December 2017

ग़ज़ल

तारीफ़ से हबीब कभी तर नहीं हूँ’ मैं
मुहताज़ के लिए कभी’ पत्थर नहीं हूँ’ मैं |
वादा किया किसी से’ निभाया उसे जरूर
इस बात रहनुमा से’ तो’ बदतर नहीं हूँ’ मैं |
वो सोचते गरीब की’ औकात क्या नयी
जनता हूँ’ शाह से कहीं’ कमतर नहीं हूँ’ मैं |
जनमत ने रहनुमा को’ जिताया चुनाव में
हर जन यही कहे अभी’ नौकर नहीं हूँ’ मैं |
अल्लाह ने दिया मेरा’ जीवन, करीम हैं
उन्नत नसीब लान से ऊपर नहीं हूँ’ मैं |
समझो मुझे प्रवाहिनी’ सरिता, बुझाती’ प्यास
खारा नमक भरा हुआ’ सागर नहीं हूँ’ मैं |
हर बात पर विकाश की’ बातें नहीं मैं’ की
मंत्री या’ बेवफा को’ई’ रहबर नहीं हूँ’ मैं |
इस देश की वजूद, हिफाज़त के’ वास्ते
खुश हो चढ़ूँ सलीब पे’, कायर नहीं हूँ’ मैं |
शब्दार्थ : लान=आजार वैजन के खुबसूरत पर्वत
रहबर-नेता ,अगुआ ; सलीब=सूली
कालीपद'प्रसाद

Monday, 13 November 2017

ग़ज़ल

ये जिंदगी तो’ हो गयी’ दूभर कहे बग़ैर
आता सदा वही बुरा’ अवसर कहे बग़ैर |
बलमा नहीं गया कभी’ बाहर कहे बग़ैर
आता कभी नहीं यहाँ’, जाकर कहे बग़ैर |
है धर्म कर्म शील सभी व्यक्ति जागरूक
दिन रात परिक्रमा करे’ दिनकर कहे बग़ैर |
दुर्बल का’ क़र्ज़ मुक्ति सभी होनी’ चाहिए
क्यों ले ज़मीनदार सभी कर कहे बग़ैर |
सब धर्म पालते मे’रे’ साजन, मगर है’ दूर
आकर गए तमाम निभाकर, कहे बग़ैर |
मिलने में’ थी हँसी ख़ुशी’ अब चैन भी नहीं
सुख चैन ले गए वो’ चुराकर कहे बग़ैर |
चौकस रहो सदा सभी’, गलती न कर कभी
बैरी चलाते’ विष बुझी’ नस्तर कहे बग़ैर |
जीवन सदैव धन्य हो’ चौकस विवेक हो
आती विपत्तियाँ सभी’ अक्सर कहे बग़ैर |
ये ज़िंदगी है’ चार दिनों की, अधिक नहीं
जाते सभी ‘प्रसाद’ रुलाकर कहे बग़ैर |
कालीपद 'प्रसाद'

Sunday, 5 November 2017

ग़ज़ल

अकसीर दवा भी अभी’ नाकाम बहुत है
बेहोश मुझे करने’ मय-ए-जाम बहुत है |
वादा किया’ देंगे सभी’ को घर, नहीं’ आशा
टूटी है’ कुटी पर मुझे’ आराम बहुत है |
प्रासाद विशाल और सुभीता सभी’ भरपूर
इंसान हैं’ दागी सभी’, बदनाम बहुत है |
है राजनयिक दंड से’ ऊपर, यही’ अभिमान
शासन करे स्वीकार, कि इलज़ाम बहुत है |
साकी की’ इनायत क्या’ कहे,दिल का फ़साना
आगोश में’ थी मेरे’ ये ईनाम बहुत है |
अकसीर - बहु गुण वाला
कालीपद 'प्रसाद'

Thursday, 19 October 2017

दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं


दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं 

***********************

एक दीप ऐसा जले, मन का तम हो दूर
जब मन का तम दूर हो, मिले ख़ुशी भरपूर |

सबकी इच्छा पूर्ण हो, दैव योग परिव्याप्त
हँसी ख़ुशी आनंद हो, रिध्दि सिध्दि हो प्राप्त |
 *************शुभ दिवाली*************


कालीपद 'प्रसाद'



Wednesday, 11 October 2017

ग़ज़ल

सटीक बात की’, आक्षेप बाँधनू क्या है
ये’ बातचीत में’ खरसान बैर बू क्या है?

नया ज़माना’ नया है तमाम पैराहन
अगर पहन लिया वो वस्त्र, फ़ालतू क्या है |

हसीन मानता’ हूँ मैं उसे, नहीं शोले
नजाकतें जहाँ’ है इश्क, तुन्दखू क्या है |

किया करार बहुत आम से चुनावों में
वजीर बनके’ कही रहबरी, कि तू क्या है ?

हो वुध्दिमान मिला राज, अब करो कुछ भी   
उलट पलट करो’ खुद आप, गुफ्तगू क्या है |

ये’ कर्ण फूल, गले हार, हाथ में कंगन  
पहन लिया सभी’ कुछ, और आरजू क्या है ?

जला जो’ आग से’ कश्मीर, भष्म में है क्या
वो’ खंडहर में’ बची लाश की’ जुस्तजू क्या है ?

सभी को’ है पता’ मंत्री बना अभी “काली”
नहीं तो’ देश में’ उसकी भी’ आबरू क्या है |

शब्दार्थ :-
बाँधनू – मन गढ़ंत , खरसान –तेज , बू –गंध
तुन्दखू-गुस्सैल;तेज मिज़ाज़, जुस्तजू –खोज, गवेषणा

कालीपद 'प्रसाद'

Friday, 22 September 2017

नव रात्रि में प्रार्थना


शैल की पुत्री शैलजा तू, 
सारे जग की यशस्विनी माँ,
योगिनी रूप, करती है तप 
है तू ही ब्रह्मचारिणी माँ |
चन्द्रघन्टा, कूष्मांडा रूप 
स्कन्दमाता, कात्यायनी माँ |
तू कालरात्री, महागौरी 
सिद्धि दात्री सिंह वाहिनी माँ |
मंगल करनी शरणागत का 
सर्वदा संकट मोचनी माँ |
असूर संहार हेतु है तू 
पास, खड्ग, शूल धारिणी माँ |
दैहिक मानसिक कष्ट मेरा 
दूर कर, शोक बिनाशिनी माँ |
तू सर्व कर्म फल प्रदायिनी 
महिष मर्दिनी, विन्द्ध वासिनी माँ |
ईमान मान धर्म आचरण 
सदैव तू धर्म धारिणी माँ |
करुना सागर, विपत्तारिणी 
तम हारिणि ज्ञान दायिनी माँ |
मंत्र तंत्र हीन, हूँ मैं दीन 
कृपा मुझ पर कर सुरेश्वरि माँ |
कालीपद 'प्रसाद'

Sunday, 17 September 2017

ग़ज़ल

बुझे’ रिश्तों का’ दिया अब तो’ जला भी न सकूँ
प्रेम की आग की’ ये ज्योत बुझा भी न सकुं |

हो गया जग को’ पता, तेरे’ मे’रे नेह खबर
राज़ को और ये’ पर्दे में’ छिपा भी न सकूँ | 

गीत गाना तो’ मैं’ अब छोड़ दिया ऐ’ सनम
गुनगुनाकर भी’ ये’ आवाज़, सुना भी न सकूँ |

वक्त ने ही किया’ चोट और हुआ जख्मी मे’रे’ दिल  
जख्म ऐसे किसी’ को भी मैं’ दिखा भी न सकूँ |

बेरहम है मे’रे’ तक़दीर, प्रिया को लिया’ छीन
ये वो’ किस्मत का’ लिखा है जो’ मिटा भी न सकूँ |

बाल सूरज हो’ गया अस्त है’ सूनी माँ’ की’ गोद
आँख सूखी, न गिला किन्तु रुला भी न सकूँ |

ख़ूनी चालाक था’ गायब किया’ सब औजारें
साक्ष्य कोई नहीं’ उसको तो’ फँसा भी न सकूँ |

मिला’ है प्यार मुझे मांगे’ बिना यार मे’रे
वो’ है’ ‘काली’ मेरा पाथेय, लुटा भी न सकूँ |

कालीपद 'प्रसाद'

Sunday, 10 September 2017

ग़ज़ल

यह खुश नसीबी’ ही थी’, कि तुमसे नज़र मिले
हूराने’ खल्क जैसे’ मुझे हमसफ़र मिले |
किस्मत कभी कभी ही’ पलटती है’ अपनी’ रुख
डर्बी के ढेर में तेरे जैसे गुहर मिले |
था बेसहारा’ गरीब, सहारा मिला नहीं
क्या लाग देख जान, मुझे तेरा घर मिले |
है दूर देश में पिया’ मेरे, भेजना है ख़त
वीरान मुल्क में कोई तो नामबर मिले |
मिलते रहे सदा गले’ ओ हाथ रस्म में
मजबूत दोस्ती में’ जिगर से जिगर मिले |
नेता सभी पसंद करे नार, ज़र, ज़मीन
बंधन नहीं कहाँ कहाँ से किस कदर मिले |
इंसान हो गए हैं’ दयाहीन संगदिल
इंसानियत को’ एक रहम दिल बसर मिले |
खुद को न बंद रखना’ उदासी हिजाब में
संसार में सदैव को’ई रहगुज़ार मिले |
गुहर =गौहर ,मोती
लाग=मज़ाक़
बसर =आदमी , रहगुज़ार = रास्ता, राह
कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 16 August 2017

संकल्प से सिद्धि (गीत)

संकल्प से सिद्धि’ (गीत)
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, भारतवर्ष में सफल हो |
दुआ करो सब देश वासियों, भारत सबसे निर्मल हो ||(टेक )
१ 
सुविधा छोड़े नेता अपना, गाँधी जी का मार्ग चुने
गरीब को रखकर ज़मीर में, फंदा योजना का बुने
मतदाता की सुने आवाज़, बंद मार काट दंगल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,......

घूसखोरी, धोखाधड़ी सभी, दफ्तरों में अब बंद हो
मंत्री से संत्री तक अब सब, ईमान का आदर्श हो
मुफलिस करोडपति व्यापारी, ईमां उसका अविचल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, .......

घोटाला काला बाजारी, ईमान को खा रहा है
भ्रष्टाचार मुनाफाखोरी, ज़मीर को बेच रहा है
समाप्त हो सारे बुराइयाँ, तो भारत का मंगल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,......
,

बाहुबल, धनबल का क्या काम, जब स्वच्छ होगा जनतंत्र
ईमान से लडे चुनाव सब, ईमान ही हो सबके मंत्र
बेईमानी छोड़े सब अब, सबका चरित्र सुविमल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, ..........
|

स्वच्छ सजीला भारत सारा, गन्दगी का नाम न रहे
सौचालय हर घर में होवे, ये बात सदा याद रहे
कूड़ेदान में कूड़े गिरे, घर बाहर सभी विमल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,......

जात-पात सम्प्रदाय समूह, दकियानूसी कट्टरपन
समूल समाप्त करना सबको, जन जन में हो अपनापन
ख़त्म बुराई मानस से हो, सब जीवन सहज सरल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, ........

हर हाथ के लिए काम मिले, भूख से न हो अब मौतें
हर सर के लिए एक छत हो, सड़क पर न रैन बीते
लोक कल्याण काम में सदा, ईमान कभी ना दुर्बल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, ........|

संचार संपन्न सभी गाँव, सड़कों का हो निर्माण
परिपक्व होगा भारत देश, गावों का बढ़ेगा मान
ग्रामीण को सब प्रभुत्व, जंगल उनका अंचल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, .........
|

शिक्षा का हो प्रचार प्रसार, विद्यालय हो गावों में
दंड मिले उन व्यापारी को, जुड़े विद्या व्यापार में
“प्रसाद’ सब हो ईमानदार, काला धन अब न धवल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,
१०
आज़ादी की हीरक जुबली, सब मिलकर जश्न मनाएं
पिछड़ गए जो दोस्त हमारे, हाथ पकड आगे लायें
ह्रदय कमल सब खिलकर महके, सब जनता का मंगल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, भारतवर्ष में सफल हो |
दुआ करो सब देश वासियों, भारत सबसे निर्मल हो |
कालीपद ‘प्रसाद’
16/08/2017

Monday, 24 July 2017

दोहे

मानव जीवन में सदा, कोशिश अच्छा कर्म |
मात पिता सेवा यहाँ, सदा श्रेष्ट है धर्म ||
प्रारब्ध नहीं, कर्म है, भाग्य बनाता कर्म |
पाप पुण्य होता नहीं, जान कर्म का मर्म ||
छुएगा आग हाथ से, क्या होगा अंजाम |
सभी कर्म फल भोगते, पाप पुण्य का नाम ||
बुरा काम का जो असर, उसे जान तू पाप |
है पुण्य नेक कर्म फल, करे दूर संताप ||
कालीपद 'प्रसाद'

Monday, 17 July 2017

गीतिका


न जानूँ मैं बताऊँ कैसे’, मन में जो दबाई है
जबां पर यह नहीं आती, मे’रे खूँ में समाई है |
नहीं था जीस्त में आराम, शाही खानदानों ज्यो
निभाया मैं प्रतिश्रुति और तुमने भी निभाई है |
अभी तुझको कहूँ क्या, तू बता क्यों बे-वफाई की
तेरी झूठी मुहब्बत में, प्रतिष्ठा सब जलाई है |
जनम भर हम रहेंगे साथ, वादा तो तुम्हारा था
अकेला छोड़ कर मुझको, बहुत तुमने रुलायी है |
दिखाती प्यार बेहद थी सदा, पर छोड़ी’ क्यों अब हाथ
बिना बोले चले जाना, यही तेरी बुराई है |
सदा तुम खेलती थी, गेंद बेचारा मेरा दिल था
मुहब्बत के वो’ खेलों में, वफ़ा तुमने भुलाई है |
गज़ब नाराजगी तेरी, उफनती वो पयस जैसा
हो’ जाती शांत जब, लगती है’ तू मीठी मलाई है |
कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 5 July 2017

ग़ज़ल

जहाज़ चाहिए’ तूफानी’ बेकराँ^ के लिए
विशिष्ट गुण सभी, जी एस* इम्तिहाँ के लिए|

है’ कायदा यहाँ धरती के’ आदमी वास्ते
नहीं नियम को’ई’ भी जंद आसमाँ के लिए |

अवाम डरते’ थे’ तब लाल आँख को देखकर
समाप्त डर हुआ मिज़्गाँ-ए-खूँशियाँ@ के लिए |

महुष्य जाति यहाँ, आते’ चार दिन वास्ते  
न राम कृष्ण बने उम्रे जाविदाँ # के लिए |

यहीं पले यहीं खाते स्तवन करे पाक की
सज़ा क्या’ इन छली गद्दार राजदाँ के लिए |

शब्दार्थ : बेकराँ= कुल किनारा हीन समुद्र
जी एस= GST
मिज़्गाँ-ए-खूँशियाँ@= रक्त रंजित लाल पलकें
उम्रे जाविदां#=शाश्वत जीवन
जंद =बड़ा,विशाल,महान

कालीपद 'प्रसाद'




Friday, 30 June 2017

उपन्यास "कल्याणी माँ"

एक खुश खबर !
प्रिय मित्रो , आपको यह खुश खबर देते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि मेरा उपन्यास "कल्याणी माँ' प्रकाशित हो चुका है और amazon.in and flipkart.com में उपलब्ध है | इसका लिंक नीचे दे रहा हूँ | गाँव की एक गरीब स्त्री जिसने सदियों पुरानी परम्पराओं को तोड़कर नई राह बनाई ,और लोगो की प्रेरणा बन गई ,उसकी कहानी एकबार जरुर पढ़िए | मुझे विश्वास है कि कभी आप उसके साथ हँसेंगे तो कभी उसके साथ रोयेंगे |
http://www.bookstore.onlinegatha.com/boo…/…/Kalyani-Maa.html



कालीपद 'प्रसाद'

Tuesday, 20 June 2017

दोहे

दोहे ( दार्जिलिंग पर )
बेकाबू पर्वत हुए, प्रश्न बहुत है गूढ़
हिंसा से ना हल मिले, मसला है संरूढ़ |

स्वार्थ लिप्त सब रहनुमा, प्रजागण परेशान
जनता का हित हो न हो, उनकी चली दूकान |


दोहे (रिश्तों पर )
यह रिश्ता है एक पुल, मानव है दो छोर
व्यक्ति व्यक्ति से जोड़ते, इंसान ले बटोर |

रिश्ते में गर टूट है, समझो पुल बेकार
टूटा पुल जुड़ता नहीं, नागवार संसार | 

कालीपद प्रसाद'

Friday, 16 June 2017

अतुकांत कविता

जीवन क्या है ?
वैज्ञानिक, संत साधु
ऋषि मुनि, सबने की
समझने की कोशिश |

अपनी अपनी वुद्धि की
सबने ली परीक्षा
फिर इस जीवन को
परिभाषित करने की,
की भरषक कोशिश |

किसी ने कहा,’मृग मरीचिका’
कोई इसे समझा “समझौता’
किसी ने कहा, “ भूलभुलैया”
“हमें पता नहीं, कहाँ से आये हैं
किस रास्ते आये हैं
किस रास्ते जाना है
यह भी पता नहीं
कहाँ जाना है |
जिसे हम देख रहे हैं, झूठ है
जो नहीं देख पा रहे हैं वो सच है |
बड़े बड़े साधू संत
वाइज और पादरी
का जवाब भी
एक नया भूलभुलैया है |

कई खंड काव्य
और महाकाव्य
लिखे गए है
इस भूलभुलैया पर |
किन्तु
सबके दिखाए गए मार्ग
अन्धकार के चिरकालीन
बंद दरवाज़े के पास जाकर
अंधकार में विलीन हो गए |  


कालीपद 'प्रसाद'