Sunday, 17 September 2017

ग़ज़ल

बुझे’ रिश्तों का’ दिया अब तो’ जला भी न सकूँ
प्रेम की आग की’ ये ज्योत बुझा भी न सकुं |

हो गया जग को’ पता, तेरे’ मे’रे नेह खबर
राज़ को और ये’ पर्दे में’ छिपा भी न सकूँ | 

गीत गाना तो’ मैं’ अब छोड़ दिया ऐ’ सनम
गुनगुनाकर भी’ ये’ आवाज़, सुना भी न सकूँ |

वक्त ने ही किया’ चोट और हुआ जख्मी मे’रे’ दिल  
जख्म ऐसे किसी’ को भी मैं’ दिखा भी न सकूँ |

बेरहम है मे’रे’ तक़दीर, प्रिया को लिया’ छीन
ये वो’ किस्मत का’ लिखा है जो’ मिटा भी न सकूँ |

बाल सूरज हो’ गया अस्त है’ सूनी माँ’ की’ गोद
आँख सूखी, न गिला किन्तु रुला भी न सकूँ |

ख़ूनी चालाक था’ गायब किया’ सब औजारें
साक्ष्य कोई नहीं’ उसको तो’ फँसा भी न सकूँ |

मिला’ है प्यार मुझे मांगे’ बिना यार मे’रे
वो’ है’ ‘काली’ मेरा पाथेय, लुटा भी न सकूँ |

कालीपद 'प्रसाद'

Sunday, 10 September 2017

ग़ज़ल

यह खुश नसीबी’ ही थी’, कि तुमसे नज़र मिले
हूराने’ खल्क जैसे’ मुझे हमसफ़र मिले |
किस्मत कभी कभी ही’ पलटती है’ अपनी’ रुख
डर्बी के ढेर में तेरे जैसे गुहर मिले |
था बेसहारा’ गरीब, सहारा मिला नहीं
क्या लाग देख जान, मुझे तेरा घर मिले |
है दूर देश में पिया’ मेरे, भेजना है ख़त
वीरान मुल्क में कोई तो नामबर मिले |
मिलते रहे सदा गले’ ओ हाथ रस्म में
मजबूत दोस्ती में’ जिगर से जिगर मिले |
नेता सभी पसंद करे नार, ज़र, ज़मीन
बंधन नहीं कहाँ कहाँ से किस कदर मिले |
इंसान हो गए हैं’ दयाहीन संगदिल
इंसानियत को’ एक रहम दिल बसर मिले |
खुद को न बंद रखना’ उदासी हिजाब में
संसार में सदैव को’ई रहगुज़ार मिले |
गुहर =गौहर ,मोती
लाग=मज़ाक़
बसर =आदमी , रहगुज़ार = रास्ता, राह
कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 16 August 2017

संकल्प से सिद्धि (गीत)

संकल्प से सिद्धि’ (गीत)
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, भारतवर्ष में सफल हो |
दुआ करो सब देश वासियों, भारत सबसे निर्मल हो ||(टेक )
१ 
सुविधा छोड़े नेता अपना, गाँधी जी का मार्ग चुने
गरीब को रखकर ज़मीर में, फंदा योजना का बुने
मतदाता की सुने आवाज़, बंद मार काट दंगल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,......

घूसखोरी, धोखाधड़ी सभी, दफ्तरों में अब बंद हो
मंत्री से संत्री तक अब सब, ईमान का आदर्श हो
मुफलिस करोडपति व्यापारी, ईमां उसका अविचल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, .......

घोटाला काला बाजारी, ईमान को खा रहा है
भ्रष्टाचार मुनाफाखोरी, ज़मीर को बेच रहा है
समाप्त हो सारे बुराइयाँ, तो भारत का मंगल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,......
,

बाहुबल, धनबल का क्या काम, जब स्वच्छ होगा जनतंत्र
ईमान से लडे चुनाव सब, ईमान ही हो सबके मंत्र
बेईमानी छोड़े सब अब, सबका चरित्र सुविमल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, ..........
|

स्वच्छ सजीला भारत सारा, गन्दगी का नाम न रहे
सौचालय हर घर में होवे, ये बात सदा याद रहे
कूड़ेदान में कूड़े गिरे, घर बाहर सभी विमल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,......

जात-पात सम्प्रदाय समूह, दकियानूसी कट्टरपन
समूल समाप्त करना सबको, जन जन में हो अपनापन
ख़त्म बुराई मानस से हो, सब जीवन सहज सरल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, ........

हर हाथ के लिए काम मिले, भूख से न हो अब मौतें
हर सर के लिए एक छत हो, सड़क पर न रैन बीते
लोक कल्याण काम में सदा, ईमान कभी ना दुर्बल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, ........|

संचार संपन्न सभी गाँव, सड़कों का हो निर्माण
परिपक्व होगा भारत देश, गावों का बढ़ेगा मान
ग्रामीण को सब प्रभुत्व, जंगल उनका अंचल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, .........
|

शिक्षा का हो प्रचार प्रसार, विद्यालय हो गावों में
दंड मिले उन व्यापारी को, जुड़े विद्या व्यापार में
“प्रसाद’ सब हो ईमानदार, काला धन अब न धवल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा,
१०
आज़ादी की हीरक जुबली, सब मिलकर जश्न मनाएं
पिछड़ गए जो दोस्त हमारे, हाथ पकड आगे लायें
ह्रदय कमल सब खिलकर महके, सब जनता का मंगल हो
‘संकल्प से सिद्धि’ का नारा, भारतवर्ष में सफल हो |
दुआ करो सब देश वासियों, भारत सबसे निर्मल हो |
कालीपद ‘प्रसाद’
16/08/2017

Monday, 24 July 2017

दोहे

मानव जीवन में सदा, कोशिश अच्छा कर्म |
मात पिता सेवा यहाँ, सदा श्रेष्ट है धर्म ||
प्रारब्ध नहीं, कर्म है, भाग्य बनाता कर्म |
पाप पुण्य होता नहीं, जान कर्म का मर्म ||
छुएगा आग हाथ से, क्या होगा अंजाम |
सभी कर्म फल भोगते, पाप पुण्य का नाम ||
बुरा काम का जो असर, उसे जान तू पाप |
है पुण्य नेक कर्म फल, करे दूर संताप ||
कालीपद 'प्रसाद'

Monday, 17 July 2017

गीतिका


न जानूँ मैं बताऊँ कैसे’, मन में जो दबाई है
जबां पर यह नहीं आती, मे’रे खूँ में समाई है |
नहीं था जीस्त में आराम, शाही खानदानों ज्यो
निभाया मैं प्रतिश्रुति और तुमने भी निभाई है |
अभी तुझको कहूँ क्या, तू बता क्यों बे-वफाई की
तेरी झूठी मुहब्बत में, प्रतिष्ठा सब जलाई है |
जनम भर हम रहेंगे साथ, वादा तो तुम्हारा था
अकेला छोड़ कर मुझको, बहुत तुमने रुलायी है |
दिखाती प्यार बेहद थी सदा, पर छोड़ी’ क्यों अब हाथ
बिना बोले चले जाना, यही तेरी बुराई है |
सदा तुम खेलती थी, गेंद बेचारा मेरा दिल था
मुहब्बत के वो’ खेलों में, वफ़ा तुमने भुलाई है |
गज़ब नाराजगी तेरी, उफनती वो पयस जैसा
हो’ जाती शांत जब, लगती है’ तू मीठी मलाई है |
कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 5 July 2017

ग़ज़ल

जहाज़ चाहिए’ तूफानी’ बेकराँ^ के लिए
विशिष्ट गुण सभी, जी एस* इम्तिहाँ के लिए|

है’ कायदा यहाँ धरती के’ आदमी वास्ते
नहीं नियम को’ई’ भी जंद आसमाँ के लिए |

अवाम डरते’ थे’ तब लाल आँख को देखकर
समाप्त डर हुआ मिज़्गाँ-ए-खूँशियाँ@ के लिए |

महुष्य जाति यहाँ, आते’ चार दिन वास्ते  
न राम कृष्ण बने उम्रे जाविदाँ # के लिए |

यहीं पले यहीं खाते स्तवन करे पाक की
सज़ा क्या’ इन छली गद्दार राजदाँ के लिए |

शब्दार्थ : बेकराँ= कुल किनारा हीन समुद्र
जी एस= GST
मिज़्गाँ-ए-खूँशियाँ@= रक्त रंजित लाल पलकें
उम्रे जाविदां#=शाश्वत जीवन
जंद =बड़ा,विशाल,महान

कालीपद 'प्रसाद'




Friday, 30 June 2017

उपन्यास "कल्याणी माँ"

एक खुश खबर !
प्रिय मित्रो , आपको यह खुश खबर देते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि मेरा उपन्यास "कल्याणी माँ' प्रकाशित हो चुका है और amazon.in and flipkart.com में उपलब्ध है | इसका लिंक नीचे दे रहा हूँ | गाँव की एक गरीब स्त्री जिसने सदियों पुरानी परम्पराओं को तोड़कर नई राह बनाई ,और लोगो की प्रेरणा बन गई ,उसकी कहानी एकबार जरुर पढ़िए | मुझे विश्वास है कि कभी आप उसके साथ हँसेंगे तो कभी उसके साथ रोयेंगे |
http://www.bookstore.onlinegatha.com/boo…/…/Kalyani-Maa.html



कालीपद 'प्रसाद'