Thursday, 27 February 2020

कविता -दिल्ली क्यों जला रहा है ?

दिल्ली क्यों जल रहा है ? छुपके चुपके खामोश षड़यंत्र रचा जा रहां है, तिल-तिल आहत संविधान हिंसा द्वेष से प्रजातंत्र जल रहा है | प्रजा हित प्रमुख है या शासक का दम्भ ? यही ला रहा है धीरे से शांत समाज में भूकंप | शासन के लिए बहुमत अवश्य जरुरी है, सुशासन के लिए सशक्त विपक्ष भी जरुरी है | विपक्ष ही निरंकुश, झक्की शासक का अंकुश है, भोली-भाली जनता को आगे इसको समझना है | हर घर का एक वोट पक्ष में दुसरा वोट पड़े विपक्ष में, तभी प्रजा की हित होगी देश रहेगा सलामत में | निरंकुशता का फल आपातकाल या तानाशाही, भारत भुगत चुका आपातकाल और एकल राजशाही | धर्म, जाति, वर्ण के आढ़ में और खेल न खेलो, बदल गया है युग, यह कलि सच्चा विकास करो, देश संभालो | कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 25 December 2019

ग़ज़ल


जिंदगी में यही’ पल शाद आया
जश्न का वक्त कि जल्लाद आया |

कौन बेपीर ये’ बेदाद आया
ध्यान देना जरा’ उन्माद आया |

सब सितमगर मिले दुनिया में
मेहरबां देख खुदा याद आया |

और करना न शरारत बगां में
तीर लेके अभी’ सैय्याद आया |

चाह थी शाद मिले जीवन में
अजनबी ये दिले’ नाशाद आया |

शांति फैलाने’ ही’ आया गाँधी
गाँधी’ को मार उगरबाद आया |

क्यों प्रगति भी पड़ी धीमी ‘काली’
अर्थ शासन में’ही’ अवसाद आया |

कालीपद 'प्रसाद'

Tuesday, 24 December 2019

ग़ज़ल


१२२  १२२   १२२   १२२
कहाँ है सितारे जहाँ अच्छे अच्छे
कहाँ दिन हमारे निहाँ अच्छे अच्छे|

यहीं थी मेरी झोपडी अब नहीं है
यहाँ ढह गए आशियाँ अच्छे अच्छे |

वो’ ईमान का क्या करे जो बिकाऊ
बिके हैं सभी पासबाँ अच्छे अच्छे |

भरोसा करो पर रखो सावधानी
दिया झाँसना राजदां अच्छे अच्छे |

न मायूस हो तुम अभी से, समय है
अभी तो बचे मेहरबां अच्छे अच्छे |

गरजता भयानक किसी वक्त में था
सुखे सिन्धु वो बेकराँ अच्छे अच्छे |

लडे क्यों जमाने से’ कुस्ती बिरादर
धराशायी’ हैं पहलवां अच्छे अच्छे |

सियासत करो मत सरल आदमी से
बनो तुम कभी कद्रदां अच्छे अच्छे |

न राजा रहा राज-दरबार है अब
न वे हैं न उनके मकाँ अच्छे अच्छे |

फलक का सितम जो गिरा इस धरा पर
उजाड़े सभी वो बगां अच्छे अच्छे |

कालीपद प्रसाद 

Sunday, 8 December 2019

ग़ज़ल


२१२२ २१२२ २१२
फेरकर मुँह, मेरे वो दिलवर चले
मेरे दिल पर तीक्ष्ण, वो खंजर चले |

लोग तो मरते रहे हैं भूख से
आँख दोनों बंद कर रहबर चले |

आगे’ पीछे दायें’ बाएं क्यों चले
राह सीधी, टेढ़े’ क्यों अख्तर* चले |* सितारे 

वो नहीं चलते कभी पैदल यहाँ
गर नफा हो, लाभ में बे-पर* चले |* बिना पैर 

वक्त पर मिलते नहीं रहबर* यहाँ * नेता 
वे चुनावी दौर में दर दर चले |

हो गया आकुल सनम अब प्यार में
इश्क अपना काम नस नस कर चले |

रहनुमा वादे निभाया क्या कभी
सब यहाँ से वोट लेकर घर चले |

कालीपद 'प्रसाद'


Saturday, 7 December 2019

गीतिका


बार बार होता बलात्कार जिम्मेदार कौन है
जिस्म का होता ब्यापार जिम्मेदार कौन है ?

आज जनता के साथ न्यायालय भी चुप है
कानून हुआ निस्सार जिम्मेदार कौन है ?

बेटी बचाओ बेटी पढाओ, नारा क्या खोखला है
बेटी की राह है पुरखार, जिम्मेदार कौन है ?

भारत में क्रिमिनल कानून, कमजोर लाचार क्यों है
स्वतंत्र भारत में अत्याचार, जिम्मेदार कौन है ?

न्याय में देर के कारण, जनता हो गई हतास
सिस्टम में खो दिया एतबार, जिम्मेदार कौन है ?

अपराधी बच जाते हैं न्यायालय के दंड से क्यों
धोखा देते हैं बलबान गद्दार, जिम्मेदार कौन है ?

नेता के रक्षक चौदह, पांच सौ आम, रक्षक एक सिपाही
रक्षक हीन बेटी का घर हाहाकार, जिम्मेदार कौन है ?

तप्तिस का, न्यायालय निर्णय का वक्त निर्धारित हो
सुधार कानून में अति दरकार, जिम्मेदार कौन है ? 

कालीपद 'प्रसाद'

Friday, 6 December 2019

ग़ज़ल

देश में अब हर गली में कुछ असर होने लगा है
गाँव अब हर मामले में बेहतर होने लगा है |

डर लगा रहता हरिक क्षण,आज दिन कैसा बितेगा
अब खबर सुनता नहीं, दिल बे-खबर होने लगा है |
  
हर जगह होती लड़ाई डर नहीं कानून का भी
न्याय में है देर, इस कारण ग़दर होने लगा है |

मामला संगीन है,कोई नहीं सुनता किसी का
धीरे’ धीरे देश में जन का कदर होने लगा है |

वो फ़साना कुछ अलग है, लोग सब मायूस हैं अब
हर बशर के हाथ का रूमाल तर होने लगा है |

आदमी मजबूर होकर खोल देता मुँह कभी भी
शांत था जो जन अभी तक, अब मुखर होने लगा है |

सींप में मोती जनमती है यही फितरत बताती
काल आया कलि अभी घर में गुहर* होने लगा है |*मोती

कल तलक गुंडे लुटेरा था अभी कानून रक्षक
देश निष्काषित था’ जो, वो राहबर* होने लगा है | *मार्गदर्शक
 

कालीपद 'प्रसाद'

Thursday, 5 December 2019

ग़ज़ल



२२१  २१२२ २२१  २१२२
कोई अगर कहे इक कटु सच, बुरा न माने
अब आपके प्रशासन सब हो गए पुराने |
संतो अभी कथा वाचन बंद कर दिए हैं
विश्वास अब नहीं, झूठे हैं सभी फ़साने |
परदेश में सभी लालायित, ब्रिटेन, डच, फ्रेंच
वो पोर्तगीज आये डेरा यहीं जमाने
झगडा अभी नहीं निपटा दैर–ओ-हरम का
जो आग दैर की, कोशिश कर अभी बुझाने |
तस्वीर तेरी’ भी बिलकुल साफ़ तो नहीं है
नादान ! इसलिए कहता हूँ न मार ताने |
हर बार मात खाया है जंग में सरापा
अब तू कभी न कोशिश कर शक्ति आजमाने |
ये वक्त गत्लियाँ सारे है सुधारने का
तुझको शर्म नहीं क्या इस वक्त को गँवाने |
कालीपद 'प्रसाद'