Tuesday, 16 May 2017

ग़ज़ल

मीना–ए-मय में’ मस्त सहारा शराब है
गुज़र गया है’ वक्त, नहीं अब शबाब है |

संसार में नहीं मिला दामन किसी का’ साफ
प्रत्येक चेहरा ढका, काला नकाब है |

इलज़ाम जो लगाया’ है’ उसका सबूत क्या
हिस्सा नही मिला यही केवल इताब है |

वह्काना’ बारदात घटित होती जीस्त में
यह जिंदगी सदैव दिखाती सराब है |

उजला धवल निशा में’ दिखाती अपूर्व रूप
यह वस्त्र पहनी’ है जो’ धरा माहताब है |

दुल्हन बनी रिझा रही’ आशिक है’ बावला
ये खूशबू-ए-रंग लगे ज्यों गुलाब है |

दुनिया में खौफ है विघटन का सही वजह
कोई डरा तो’ कोई’ निडर बेहिसाब है | | 

कालीपद'प्रसाद'    

Thursday, 11 May 2017

दोहे

, गौतम बुद्ध के मूल उपदेश चार दोहे में ( एक प्रयास )
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जाति क्षेत्र के नाम से, समाज को ना बाँट
धर्म पन्थ भाषा नहीं, दोष गुणों पर छाँट |

समता ममता सब रहे, भाव भावना मूल
एक बद्ध कर चेतना,  भेद भाव है शूल |

तृष्णा इच्छा मूल है, कारण सब दुख दर्द
दीप स्वयं अपना बनो, और बनो हमदर्द |

जीव कामना शून्य हो, अहंकार मिट जाय
शील प्रज्ञा साधना, समाधि एक उपाय |***

नाच गान जो भी किया, मानव सभी प्रकार
कीर्तन जैसा गान में, है आनंद अपार |


कालीपद ‘प्रसाद’

Sunday, 7 May 2017

ग़ज़ल

पाक माना धूर्त है, चालाकी’ दिखलायेंगे’ क्या
देश के गद्दारों’ को, फिर पाक उकसायेंगे’ क्या ?

जान न्यौछावर की’ सैनिक देश रक्षा के लिए
ये सहादत से सियासत नेता’ चमकाएंगे’ क्या ?

चाहते थे वे कहे कुछ मोहनी बात और भी
जुमले’ बाजी से नहीं फुर्सत तो बतलायेंगे’ क्या ?

खुद की’ नाकामी छुपाने के लिए कुछ बोलते
भड़की’ है जनता अभी तलक और भड्कायेंगे’ क्या ?

सीमा’ से आतंक वादी चोर ज्यों अन्दर घुसे
तार काँटे तेज हद पर और लगवाएंगे’ क्या ?

आयुधों का डर दिखाकर कब तलक सुरक्षित रकीब
हम खड़े हैं युद्ध स्थल पर मस्त, घबराएंगे’ क्या ?

कालीपद 'प्रसाद'

Friday, 5 May 2017

सुचना

नमस्कार मित्रो ! मेरे ब्लॉग का URL जब से http से https हो गया है (AUTOMATIC) तब से dashboard नहीं खुल रहा है |इस कारण मैं  किसी  की  भी  रचना पढ़ नहीं पा रहा हूँ और न टिप्पणी दे पा रहा हूँ | क्या कोई मुझे मदत कर सकता है ताकि डैशबोर्ड फिर से खुलने लगे |

सादर
कालीपद 'प्रसाद'

लावणी छंद पर आधारित

छोड़ गए क्यों बालम मुझको, राह कौन अब दिखलाए
बच्चे हैं सब छोटे छोटे, उनको कैसे समझाए ?

कौन निर्दयी धोखा देकर, मेरे सिंदूर छिन लिया
पापा पापा चिल्लाये जब, बच्चों को क्या बतलाये ?

स्वदेश की रक्षा की खातिर, तैनात हुए सरहद पर
उनसे ऐसा बर्बरता क्यों, रहनुमा हमें समझाए |

होते गर मंत्री के रिश्ते, निंदा करके चुप होते ?
तब क्या होता जानते सभी, हमसे सच को न छुपाए |

“बलिदान न बेकार जायगा”, ये वादा है न तुम्हारा?
भारती की  आँसू पोंछने, बदला लेकर दिखलाए | 

कालीपद 'प्रसाद'

Thursday, 4 May 2017

ग़ज़ल

आज़ाद हैं यहाँ सभी’ उल्फत ही’ क्यूँ न हो
पावंदी’ भी को’ई नहीं’ तुहमत ही’ क्यूँ न हो |

मिलते सभी गले ही’ अदावत ही’ क्यूँ न हो
दिल से नहीं हबीब मुहब्बत ही’ क्यूँ न हो |

हर देश द्रोही’ जिसने’ किया धोखा’ देश से
गद्दार को सज़ा मिले हिजरत ही’ क्यूँ न हो |

तक़दीर क्या हनोज़ तजुर्बा हुआ नहीं
कुछ तो मिले नसीब, क़यामत ही’ क्यूँ न हो |

फैले हैं हाथ भक्त के’ दृग सामने तेरे
कुछ तो मिले अदीम, हकारत ही’ क्यूँ न हो |

अनुराग यदि पसंद नहीं, बावफा मेरी  
जलवत नसीब में नहीं’, खल्वत ही’ क्यूँ न हो |

गफलत भरा रिवाजें’ सभी दर्दनाक जो
कर त्याग सभी को’ रिवायत ही’ क्यूँ न हो |

कालीपद 'प्रसाद'

Thursday, 27 April 2017

ग़ज़ल

वो अश्क भरा चश्म, समुन्दर न हुआ था
उस दीद से’ दिल भर गया’, पर तर न हुआ था |
तू दोस्त बना मेरा’ चुराकर न हुआ था
संसार कहे कुछ भी’ सितमगर न हुआ था |
वर्षों से’ नहीं हम मिले’, यह एक फसाना
खिंचाव कभी कुछ कहीं’, जर्जर न हुआ था |
हर बार नयन से गिरे’ आँसू, मिले’ जब हम
वो अश्रु हमारा कभी’, गौहर न हुआ था |
दुनिया ने’ किया ज़ुल्म, निखारा सभी’ सद गुण
हम भी बने’ मज़बूत, सिकंदर न हुआ था |
वो गर्म निगाहें तेरी’, कहती थी’ फ़साने
 शोला जगा’ जब दिल में’ तो’ अवसर न हुआ था |
वो सुरमई’ आखें बड़ी’, औ गाल में’ कृष तिल
सब याद है’ मुझको, कभी’ कमतर न हुआ था |
गौहर –मोती
कालीपद ‘प्रसाद’

Thursday, 6 April 2017

ग़ज़ल


बिन तेरे जिंदगी में’ पहरेदार भी नहीं
दुनिया में’ अब किसी से’ मुझे प्यार भी नहीं |

बेइश्क जिंदगी नहीं’ आसान है यहाँ  
इस मर्ज़ की दवा मिले’ आसार भी नहीं |

कटती नहीं निशा ते’रे’ दीदार के बिना
दीदार और का कभी’ स्वीकार भी नहीं |

अब काटना है उम्र ख़ुशी हो या’ गम सनम
तू याद में बसेगी’ तो’ दुश्वार भी नहीं |

अनजान देश में कभी’ तुम यदि उदास हो
सन्देश किस तरह मिले’ अखबार भी नहीं |

दीवानगी 'प्रसाद' पे’ वहशत की हद हुई
अब वेदना का’ को’ई’ भी आजार भी नहीं |

दिल से अगर कभी कभी’ मिलता नहीं है’ दिल
समझौता’ मायने नहीं’ तकरार भी नहीं |

इनकी कला बखान करूँ क्या खुदा बता
लड़ते हैं’ और हाथ में’ तलवार भी नहीं |( गिरह )

शब्दार्थ
दुश्वार –मुश्किल ;  आजार – दुःख/दर्द का स्वाद
वहशत – पागलपन /भय

कालीपद ‘प्रसाद’