Showing posts with label तांका. Show all posts
Showing posts with label तांका. Show all posts

Friday, 3 October 2014

शुम्भ निशुम्भ बध :भाग -10



   
घर में देवी माँ की मूर्ती







 आप सबको शारदीय नवरात्रों  ,दुर्गापूजा एवं दशहरा की   शुभकामनाएं ! गत वर्ष इसी समय मैंने महिषासुर   बधकी  कहानी को जापानी विधा हाइकु में पेश किया था जिसे आपने पसंद किया और सराहा | उससे प्रोत्साहित होकर मैंने इस वर्ष "शुम्भ -निशुम्भ बध" की कहानी को जापानी विधा "तांका " में प्रस्तुत कर रहा हूँ | इसमें २०5    तांका पद हैं ! आज नवमी और दशमी दोनों है | दशहरा भी आज है ! इसलिए भाग ९ और भाग 10 (अन्तिम भाग ) आज ही दो अलग अलग पोस्ट प्रस्तुत कर रहा हूँ |आशा है आपको पसंद आयगा |नवरात्रि में माँ का आख्यान का पाठ भी समाप्त हुआ !

भाग ९ से आगे यह अन्तिम भाग है|
शुम्भ बध
         १८३ 
तदनन्तर
देवी और शुम्भ में 
संघर्ष छिड़ा 
वाण वृष्टि तुमुल 
हुए सस्त्र  निर्मूल |
           १८४ 
काटे शुम्भ ने 
देवी के दिव्य अस्त्र 
नाशक अस्त्र,
काटकर वे अस्त्र 
चलाये दिव्या अस्त्र |
           १८५
परमेश्वरी ने 
भर शब्द हुंकार
खिलवाड़ में 
किया नष्ट वाणों को
हुआ कुपित दैत्य |
            १८६ 
शुम्भ ने किया 
आच्छादित देवी को 
वाण वर्षा से 
क्रोधित देवी ने भी
काटे शुम्भ धनुष |
         १८७ 
दैत्यराज ने 
लिया शक्ति हाथ में 
काटी देवी ने 
उसके शक्ति को भी 
अपने चक्र द्वारा |
         १८८ 
दैत्य के स्वामी
ढाल और तलवार
उठाता तब 
धावा किया क्रोध में 
महादैत्य शम्भू  ने |
          १८९ 
उज्ज्वल ढाल
सूर्य रश्मि चमक 
तलवार को
तीखे वाणों के द्वारा 
देवी ने काट डाला |
           १९० 
शम्भू के घोड़े 
सारथि मारे गए 
रथ हीन थे 
,उठाकर मुद्गर 
उद्दत देवी ओर|
         १९१ 
देख देवी ने 
काटी तीक्ष्ण वाणों से 
दैत्य हाथ के 
भयंकर मुद्गर 
बहुत आसानी से |
           १९२ 
इस पर भी 
झपटा देवी ओर
बड़े वेग से 
मारा मुक्का देवी को 
शुम्भ दैत्यराज  ने |
           १९३ 
मारा देवी ने 
जोरसे चांटा एक 
शुम्भ छाती में 
मार खाकर शुम्भ 
गिर पड़ा भू पर |
           १९४ 
किन्तु पुनश्च 
तेजी से उठकर 
खड़ा हो गया 
उछला दैत्य फिर
चंडिका के ऊपर|
           १९५ 
असुर शुम्भ 
आकाश में जाकर 
खड़ा हो गया 
चण्डिका भी उछली 
आकाश में पहुंची |
          १९६ 
लड़ने लगे 
बिना किसी आधार 
एक दूजे से 
बहुत देर तक 
संग्राम के दौरान .....
          १९७ 
चण्डिका देवी 
उठाकर घुमाया 
शम्भू दैत्य को 
और पटक दिया 
जोर से पृथ्वी पर |
        १९८ 
दुष्टात्मा दैत्य 
फिर खड़ा होकर 
दौड़ा वेग से 
सम्पूर्ण ताकत से 
मारने चंडिका को |
        १९९ 
दैत्य के राजा 
शुम्भ को आते देख 
उठाया शूल 
त्रिशूल से देवी ने 
छेदा शुम्भ छाती को ....
          200 
शुम्भ असुर 
गिर पड़ा भू पर 
काँपी धरती 
उड़ा प्राण पखेरू 
महा दैत्य शुम्भ के |
        २०१
पूरा त्रिलोक 
हुआ प्रसन्न स्वस्थ 
आकाश स्वच्छ 
शांत सब उत्पात 
समित  उल्कापात |
        २०२ 
शुम्भ मृत्यु से 
गाये गन्धर्व गण 
मधुर गीत 
देवता भी प्रसन्न 
जगत उल्लसित |
         २०३ 
बाजा बजाए 
देव-गन्धर्व सब 
अप्सरा नाची 
मधुर संगीत से 
प्लावित जगत भी |
         २०४ 
समाप्त हुआ 
कहानी शुम्भ बध 
जय चण्डिका 
जय जय चण्डिका 
नम:त्वम चण्डिका |
           २०५ 
देवी की स्तुती
गाये सब गण भी
देवगण  भी
गाये त्रिशूल धारी
गाये ब्रह्मा विष्णु भी |

     ---इति---

दुर्गा पूजा और दशहरा का हार्दिक शुभकामनाएं !


कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित




शुम्भ निशुम्भ बध :भाग ९

                                                  

        आप सबको शारदीय नवरात्रों  ,दुर्गापूजा एवं दशहरा की   शुभकामनाएं ! गत वर्ष इसी समय मैंने महिषासुर   बधकी  कहानी को जापानी विधा हाइकु में पेश किया था जिसे आपने पसंद किया और सराहा | उससे प्रोत्साहित होकर मैंने इस वर्ष "शुम्भ -निशुम्भ बध" की कहानी को जापानी विधा "तांका " में प्रस्तुत कर रहा हूँ | इसमें २०5    तांका पद हैं ! आज नवमी और दशमी दोनों है | दशहरा भी आज है ! इसलिए भाग ९ और भाग 10 (अन्तिम भाग ) आज ही दो अलग अलग पोस्ट प्रस्तुत कर रहा हूँ |आशा है आपको पसंद आयगा |नवरात्रि में माँ का आख्यान का पाठ भी समाप्त हुआ !


    भाग ८ से आगे
     १६३
दैत्यराज ने
दस भुजा से फेंका
चक्र सहस्र
बना चक्र का जाल
आच्छादित भवानी |
       १६४
माता दुर्गा ने
काट दिया चक्रों को
वाण वर्षा से
निशुम्भ देखकर
गरजे भयंकर |
       १६५
बध करने
महा चण्डिका देवी
वेग से दौड़ा
उत्तेजित असुर
हाथ में लिए गदा |
       १६६
देवी चंडी ने
काट डाली गदा को
तलवार से
महादैत्य क्रोधित
शूल हाथ में लिया |
      १६७
चंडिका ने भी
वेग से फेंका शूल
लक्ष निशुम्भ
शूल से छाती छेद
गिर पड़े निशुम्भ |
       १६८
दूसरा एक
महावली असुर
प्रगट हुआ
दैत्य वक्षस्थल से
निशुम्भ के ही जैसे |
      १६९
कहा उसने ....
खड़ी रह आता हूँ
कहाँ भागोगी ?
सुनकर उसको
जोर से हँसी देवी |
         १७० 
खड्ग से काटा
मस्तक असुर का 
गिरा भू पर
तदनंतर सिंह
उसको खाने लगा |
          १७१
शिवदूती ने
दुसरे दैत्यों का भी
भक्षण किया
कुमारी की  शक्ति से
दैत्य हत अनेक |
          १७२
माहेश्वरी ने
त्रिशूल द्वारा किया
शत्रु हनन
बाराही के थूथुन
किया दस्यु  हनन !
        १७३
वैष्णवी ने भी
टुकड़े टुकड़े की
बहु दैत्यों को
मन्त्रपूत जल से
ब्राह्मणी की निस्तेज
        १७४
ऐन्द्री के हाथ
 बज्र से हताहत
हाथ धो बैठे
महादैत्य अनेक
खुद प्रिय प्राण से |
         १७५
असुर नष्ट
कुछ बचाके प्राण
किया प्रस्थान  
कुछ बने भोजन
काली ,सिंह के ग्रास |
       १७६
शम्भू बध

निशुम्भ हत
सेना क्षत विक्षत
शुम्भ कुपित
शुम्भ किया गर्जन
इकट्ठा सेना फिर |
       १७७
कहा शम्भू ने
बल का अभिमान
झूठ मुठ का
मुझे न दिखा दुर्गे
दम्भ तोडूंगा तेरा |
        १७८
तू सोचती है
तू बड़ी मानिनी है
तू है निर्बला 
लडती है लेकर
दुसरे स्त्री सहारा |
        १७९
कहा देवी ने
दुष्ट ! मैं अकेली हूँ
देख ध्यान से
देख ,ये सब रूप
है विभूतियाँ मेरी  |
         १८०
तदनंतर
ब्राह्मणी शिव आदि
सब देवियाँ
देवी के शरीर में
शीघ्र लीन हो गई |
       १८१
अम्बिका एक
देवी ही रह गई
देख ऐ दुष्ट !
कहा देवी ने चीखा
मैंने लिया समेट |
      १८२
सब रूपों को
अब अकेली ही हूँ
युद्ध में खड़ी
संभल जा अब तू
आसन्न मृत्यु तेरा !


नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएं !
        
 क्रमशः

कालीपद "प्रसाद'
सर्वाधिकार सुरक्षित




Wednesday, 1 October 2014

शुम्भ निशुम्भ बध :भाग ८

                                              



आप सबको शारदीय नवरात्रों  ,दुर्गापूजा एवं दशहरा का  शुभकामनाएं ! गत वर्ष इसी समय मैंने महिषासुर बध की  कहानी को जापानी विधा हाइकु में पेश किया था जिसे आपने पसंद किया और सराहा | उससे प्रोत्साहित होकर मैंने इस वर्ष "शुम्भ -निशुम्भ बध" की कहानी को जापानी विधा "तांका " में प्रस्तुत कर रहा हूँ | इसमें २०१ तांका पद हैं ! दशहरा तक प्रतिदिन 20/२१ तांका प्रस्तुत करूँगा |आशा है आपको पसंद आयगा |नवरात्रि में माँ का आख्यान का पाठ भी हो जायगा !


  भाग 7 से आग
   निशुम्भ बध

        १४३
विशाल सेना
रक्तबीज समेत
हुए निष्प्राण
देख शुम्भ निशुम्भ
क्रोधित भयंकर |
        १४४
दैत्य प्रधान
निकुम्भ अमर्ष में
सेना के साथ
दौड़ा देवी की ओर
पार्श्वभाग में सेना |
         १४५
सेना के साथ
पराक्रमी शुम्भ भी
मात्री गणों से
युद्ध के लिए आया
मारने चण्डिका को |
                            १४६                               
चण्डिका संग 
शुम्भ निशुभ घोर
संग्राम किया
वे दोनों महा दैत्य
वाणों की वृष्टि किया |
            १४७
मेघों की भांति
वाण वर्षा झुण्ड को
निरस्त किया
चण्डिका ने वाणों से
अन्य अस्त्रों शास्त्रों से |
           १४८-149
चोटिल किया
दैत्य पति अंगों को
जख्मी असुर
निशुम्भ तलवार
सिंह मस्तक पर .....
किया प्रहार
अपने बाहन को
घायल देख
वाण से निशुम्भ की
तलवार काट दी |
      १५०
निशुम्भ शूल
चलाये देवी पर
चलायी  शक्ति
चक्र और मुक्के से
देवी ने चूर्ण किया |
     १५१
गदा फरसा
देवी के त्रुशुल से
भस्म हो गया
वाण वर्षा से बींध
गिरा दिया भू पर |
        १५२
मुर्च्छित भाई
शुम्भ क्रोध बढाई
सीमा के पार
अम्बा देवी का बध
मन में लिए साध |
          १५३
बढ़ाया पग
रथ पर आरूढ़
श्रेष्ट आयुध
सुसज्जित सारथि
वह अद्भुत शोभा |
        १५४
शंख बजाया
देवी ने उसे देखा
चढ़ा प्रत्यंचा
धनुष की टंकार
दुस्सह शब्द किया |
          १५५
घंटा ध्वनी  से
दिशाएँ की गुंजित
महादेवी ने
दैत्य तेज बिनष्ट
की सम्पूर्ण रूप से
          १५६
तदनंतर
सिंह ने की गगन
भेदी दहाड़
सुनकर जिसको
टुटा गज का मद |
        १५७
इससे हुआ
शुम्भ को बड़ा क्रोध
थर्राया दैत्य
देवी ने कहा ,-रुक
दुरात्मन असुर |
         १५८
शक्ति चलायी
दैत्यराज शुम्भ  ने
ज्वाला से युक्त
अग्निमय शक्ति को
देवी ने हटा दिया |
           १५९
शुम्भ गर्जन
प्रकम्पित त्रिलोक
प्रतिध्वनी से
बज्रपात समान
भयंकार आवाज़|
         १६०
काटा देवी ने
शुम्भ के वाण वृष्टि
कोटि वाणों से
क्रोध में भरी हुई
चण्डिका महादेवी |
        १६१
दैत्य शुम्भ को
शूल मारा तेजी से
शुम्भ मुर्च्छित
भू पर गिर पडा
भीषण आघात से |
         १६२
चेतना लौटी
अनुज निशुभ को
इसके बीच
हाथ में ले धनुष
की घायल सिंह को |

नवरात्रों की हार्दिक  शुभकामनाएं

क्रमशः

कालीपद'प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित


      





Tuesday, 30 September 2014

शुम्भ निशुम्भ बध :भाग 7


आप सबको शारदीय नवरात्रों  ,दुर्गापूजा एवं दशहरा का  शुभकामनाएं ! गत वर्ष इसी समय मैंने महिषासुर बध की  कहानी को जापानी विधा हाइकु में पेश किया था जिसे आपने पसंद किया और सराहा | उससे प्रोत्साहित होकर मैंने इस वर्ष "शुम्भ -निशुम्भ बध" की कहानी को जापानी विधा "तांका " में प्रस्तुत कर रहा हूँ | इसमें २०१ तांका पद हैं ! दशहरा तक प्रतिदिन 20/२१ तांका प्रस्तुत करूँगा |आशा है आपको पसंद आयगा |नवरात्रि में माँ का आख्यान का पाठ भी हो जायगा !


भाग ६ से आगे 
         १२७
मात्री गणों का
असुरों का हनन
करते देख
दैत्य  सैनिक भीत
डर के भाग गए |
        १२८
भागते देख
रक्तबीज नमक
दैत्य क्रोध में
युद्ध के लिए आये
वर प्राप्त दैत्य था |
       १२९
रक्त की बूंद
उसके शरीर से
भू पर गिरे
शक्तिशाली दूसरा
दैत्य पैदा हो जाता |
         १३०
लेकर गदा
हाथ में रक्तबीज
करने लगा
युद्ध इन्द्र शक्ति से
भयंकर संग्राम ||
         १३१
तब ऐन्द्री ने
रक्तबीज को मारा
अपना बज्र
बज्राघात घायल
रक्तबीज का रक्त .....
          १३२
गिरा भू पर
हर बूंद खून से
उत्पन्न हुए
अनुरूप उसके
एक और असुर |
           १३३
दैत्य रक्त के 
जितने बूंद गिरे
उत्पन्न हुए
असुर उतने ही
रक्ताबीज समान |
          १३४
पराक्रमी थे
सब बलवान थे
वीर्यवान भी
अस्त्र शस्त्रों के साथ
युद्ध करने लगे |
          135
मात्री गण भी
असुरों के सहित
संग्राम किया
पुन; पुन: बज्र से
रक्तबीज को मारा |
           १३६
हजारों दैत्य
तब पैदा हो गए
रक्तबीज सा
सहस्त्र महादैत्य
सम्पूर्ण युद्ध स्थल |
         १३७
असुरों द्वारा
डराया देवताओं भी
हुआ चिंतित
देख देवताओं को
चिंतित ओ उदास |
         १३८
काली देवी ने
फैलाया मुख और
गिरने वाले
हर रक्त बिंदु को
मुहँ में ले पी लिया |
          १३९
महादैत्य के
रक्त को पीती हुई
प्रत्येक बूंद
रण में विचरती
महादेवी चामुण्डा|
         १४०
दैत्यों का सारा
रक्त क्षीण हो गया
क्षीण असुर
रक्तबीज का रक्त
समाप्त हुआ सब |
        १४१
चामुण्डा देवी
छोड़ा नहीं बूंद भी
पी लिया सब
चण्डिका मारी बज्र
निहत रक्तबीज |
          १४२
हर्षित देव
अनुपम आनन्द
देवलोक में
सब मात्री गण  भी
तृप्त रक्त पान से |


नवरात्रों की शुभकामनाएं |
              क्रमशः

कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित

Sunday, 28 September 2014

शुम्भ निशुम्भ बध -भाग 6


                                                           

                                                                 

                                                                      भाग ५ से आगे

       १०५ 
विष्णु की शक्ति
धर रूप वैष्णवी
हाजिर हुई
हाथ में शंख चक्र
और गदा पद्म भी !
          १०६
ब्रह्मा की शक्ति
हु -बहु ब्रह्म रूप
कमंडलू से
सुशोभित ब्राह्मणी
हाथ में अक्ष माला !
           १०७
देवी शिवानी
महादेव की शक्ति
बृषभारुढ़
चन्द्रमौली शंकर
त्रिशूल-हस्त शिव |
       १०८
इन्द्र की शक्ति
बज्र हाथ में लिए
उपस्थित थीं
ऐरावत आरुड़
इन्द्र के जैसे रूप |
        १०९
अनेक शक्ति
है श्रीहरि की शक्ति
अनेक रूप
धर वराह रूप
शक्ति नृसिंह के भी |
        ११0
 देवों की शक्ति
उसी देव -रूप में
हुआ हाजिर
चंडिका के सम्मुख
रण हेतु प्रस्तुत  |
         १११
 इसके बाद
महादेव ने कहा
देवी चण्डिका
मेरी ख़ुशी के लिए
दैत्यों को संहारो ||
        ११२
उग्र चण्डिका
प्रगट हुई शक्ति
देवी काया से
कहा हे महादेव
 हे  देव आदि देव |
          ११३
जाइये आप
शुम्भ निशुम्भ पास
दूत रूप में
कहें दैत्य द्वय से
और अन्य दैत्यों से .....
          ११४
हे दैत्यों सुनो
यदि तुम्हे जीवित
जाना है घर ....
पाताळ लौट जाओ
युद्ध को यहीं छोडो |
          ११५
त्रिलोक राज्य
इन्द्र को मिलजाय
समाप्त युद्ध,
अभिमान हो तुम्हे
और यदि घमंड .....
        ११६
आओ युद्ध में
योगिनियाँ तुम्हारे
कच्चे मांस से
बहुत तृप्त होंगी
चबाकर हड्डियाँ |
             ११7 
शिव शंकर
दूत के कार्य में  भी
अति निपुण
कहा दैत्य द्वय को
चण्डिका के वचन |
          ११८
शिव के मुँह
सुन देवी वचन
महादैत्य भी
क्रोध से भर गए
तीब्र  कांपने लगे |
        ११९
कात्यायनी थीं 
विराजमान जहाँ
उधर गए
भरकर अमर्ष
अस्त्रों की वर्षा किये |
         १२०
तब देवी ने
आसान लड़ाई में
दैत्य -अस्त्रों को
जल्दी से काट डाले
जैसे खेल खेल में |
         १२१
दैवी शक्तियां
किया दैत्य संहार
अस्त्रों शास्त्रों से
वैष्णवी ने चक्र से
शिवानी र्त्रिशुल से |
          १२२
कार्तिकेय की
शक्ति ने भी शक्ति से
किया प्रहार
भयानक दैत्यों का
रक्त से लाल भूमि |
          १२३
इन्द्र के बज्र
शक्ति प्रहार ,मृत 
सैकड़ों दैत्य
युद्ध क्षेत्र में मचा
दैत्यों में हाहाकार |
         १२४
शिवदूती के
प्रचण्ड अट्टहास
मुर्च्छित दैत्य
जो गिरे पृथ्वी पर
काली के बने ग्रास |


नवरात्रों की  हार्दिक शुभकामनाएं
 क्रमशः

कालीपद "प्रसाद"
सर्वाधिकार सुरक्षित




Saturday, 27 September 2014

शुम्भ निशुम्भ बध - भाग ५

  

                                                                              
माँ स्कंदमाता


      आप सबको शारदीय नवरात्रों  ,दुर्गापूजा एवं दशहरा का अग्रिम शुभकामनाएं ! गत वर्ष इसी समय मैंने महिषासुर बध की  कहानी को जापानी विधा हाइकु में पेश किया था जिसे आपने पसंद किया और सराहा | उससे प्रोत्साहित होकर मैंने इस वर्ष "शुम्भ -निशुम्भ बध" की कहानी को जापानी विधा "तांका " में प्रस्तुत कर रहा हूँ | इसमें २०१ तांका पद हैं ! दशहरा तक प्रतिदिन 20/२१ तांका प्रस्तुत करूँगा |आशा है आपको पसंद आयगा |नवरात्रि में माँ का आख्यान का पाठ भी हो जायगा !


                                                              भाग चार से आगे 
           ८५
महा असि से
देवी ने किया वार
दैत्य चंड को
केश पकड़कर
मस्तक काट डाला |
           ८६
चंड को मरा
देखकर मुंड भी
 क्रोधित हुआ
गुस्से में हो पागल
देवी की ओर दौड़ा
           ८७
क्रोधित देवी
तलवार वार से
घायल कर
पराक्रमी दैत्य को
गिरा दी धरती पर |
          ८८ -८९
चंड-मुंड का
पतन देखकर
व्याकुल सेना
चंड और मुंड का
हाथ में मस्तक ....
कालिका देवी
चण्डिका के समीप
पहुंच गई
प्रचण्ड अट्टहास
करते हुए कहा ..
        ९०
हे देवी ! मैंने
चंड -मुंड नामक
दैत्य मस्तक
तुम्हे भेंट किया है
इसे स्वीकार करो |
           ९१
शुम्भ -निशुम्भ
करेगा अब युद्ध
होकर क्रुद्ध
कल्याणमयी चंडी
उनको तुम मारो |
          ९२
देवी चण्डिका
मीठी वाणी में कहा
काली देवी से
चंड मुंड घातिनी
तुम्हारी होगी ख्याति ...
            ९३
चराचर में
"चामुंडा " के नाम से
विख्यात होगी
पूजेंगे सब भक्त
पूर्ण हो मनोरथ |
     
रक्तबीज बध

     ९४
प्रतापी शुम्भ
मन में बड़ा क्रोध
दैत्यों का राजा
चंड मुंड के बध
सेना संहार ,क्षुब्द |
       ९५
युद्ध के लिए
सम्मूर्ण दैत्य सेना
लड़ने चले
दैत्य सेनापति को
दिया आज्ञा  शुम्भ ने |
           ९६
कम्बू कालक
दौर्हद ,मौर्यआदि
प्रस्थान करे
कालकेय असुर
युद्ध के लिए चले | 
            ९८
चण्डिका देवी
देख दैत्य सेना को
गुंजित किया
पृथ्वी और आकाश
धनुष टंकार से |
           99
तदनन्तर
देवी के सिंह किया
तीव्र दहाड़
अम्बिका ने घंटे की
ध्वनि को बढ़ा दिया |
           १००
सिंह दहाड़
धनुष की टंकार
दिशाएँ गूंजी
तीव्र घंटे की ध्वनि
भयोत्पादक नाद |
          १०१
दैत्यों की सेना
सुन विशाल नाद
एकत्रित हो
घेर लिया क्रोध में
चंडिका- चामुंडा को |
          १०२
काली देवी ने
भयंकर शब्द से
बड़ा मुख को
और भी बड़ा किया
विकराल  चेहरा |
          १०३
तदनंतर
असुरो के विनाश
देवताओं के
अभ्युदय के लिए
आई दैवी शक्तियां |
        १०४
दैवी शक्तियां
धर उन्ही के रूप
आई समक्ष
देवी चंडिका पास
महा संग्राम हेतु |


नवरात्रों और दुर्गापूजा का हार्दिक शुभकामनाएं !

(क्रमशः)

कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित




Friday, 26 September 2014

शुम्भ निशुम्भ बध -भाग ४

                  



        आप सबको शारदीय नवरात्री ,दुर्गापूजा एवं दशहरा का अग्रिम शुभकामनाएं ! गत वर्ष इसी समय मैंने महिषासुर बध की  कहानी को जापानी विधा हाइकु में पेश किया था जिसे आपने पसंद किया और सराहा | उससे प्रोत्साहित होकर मैंने इस वर्ष "शुम्भ -निशुम्भ बध" की कहानी को जापानी विधा "तांका " में प्रस्तुत कर रहा हूँ | इसमें २०१ तांका पद हैं ! दशहरा तक प्रतिदिन 20/२१ तांका प्रस्तुत करूँगा |आशा है आपको पसंद आयगा नवरात्री में माँ का आख्यान का पाठ भी हो जायगा !
    भाग ३ से आगे 

           ६४
क्रोध में भरी
विशाल दैत्य सेना
चतुर्दिशा से
जगदम्बा को घेरा
धीर वुद्धि गंभीरा |
         ६५
जगदम्बा ने
दैत्य सैन्य दलन
शक्ति से किया
देवी वाहन  सिंह
दैत्यों का नाश किया |
             ६६
पंजो से मार
किया बहु संहार
दैत्यों की सेना  
नखों से कितनों के
पेट ही फाड़ डाले |
          ६७
सेना संहार
जानकर असुर
क्रोधित हुआ
चंड -मुंड नामक
महादैत्यों को हांका |
           ६८
हे चंड -मुंड
बड़ी सेना लेकर
तुम दोनों भी
युद्ध भूमि में जाओ
उसे घसीट लाओ |
         ६९
दम्भी देवी को
झोंटे पकड़कर
या बांधकर
शीघ्र यहाँ ले आओ
देर ना करो जाओ |
          70
चंड -मुंड बध
           ७१
तदनन्तर
शुम्भ आज्ञा लेकर
चंड -मुंड की
चतुरंगिनी सेना
रणभूमि चल पडा |
         ७२
सुवर्णमय
उच्च हिम शिखर
हिमालय के
दैत्यों ने सिंह पर
बैठी देवी को देखा |
         ७३
मन्द मन्द वे
मुस्कुरा रही थी
रहस्यमयी |
उद्योग किया दैत्य
देवी को जो धरना था |
         ७४
तत्परता से
धनुष तान लिया
किसी ने शूल
कुछ दैत्य देवी को
घेर खड़े हो गए |
          ७५
भगवती भी
क्रोध में काली पड़ी
हो गई टेढ़ी
ललाट के भौंहे भी
कारण क्रोध अति |
         ७६
हुई प्रगट
विकृत मुखी काली
पास हाथ में
विचित्र खड्ग अस्त्र
और तलवार भी |
          ७७
विभूषित थी
नरमुंड माला से
चर्म की साडी
परिधान उनकी
विकराल मुखी थी |
           ७८
विशाल मुख
हड्डियों का ढांचा था
सुखा शरीर
भयंकर दर्शन
लपलपाते जिव्हा |
           ७९- ८०
आँखे गहरी
भीतर को धंसी थी
कुछ लाल थी
अपनी गर्जना  से
सम्पूर्ण दिशाओं को .....
गूंजा रही थी
शत्रु दैत्यों का बध
कर रही थी |
वे कालिका देवी थी
दैत्यों पर भारी थी |
           ८१
घोड़े ओ हाथी
रथ समेत रथी
मुँह में डाल
भयानक रूप से
सब चबा डालती |
         ८२
कालिका देवी
सारी दैत्य सेना को
मार गिराया
दांतों से पीस डाली
अस्त्रों से काट डाली |
           ८३
देखा चंड ने
अत्यंत भयानक
काली देवी को
दौड़ा उनकी ओर
पकड़ने  देवी को |
           ८४
बाणों की वर्षा
महादैत्य मुंड ने
देवी पर की 
चक्रों से भी देवी को
वे आच्छादित किया |

नवरात्रि और दुर्गापूजा का हार्दिक शुभकामनाएं !
क्रमशः.......

कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित