Tuesday, 10 December 2013

भाव -मछलियाँ



                                               


छोटी बड़ी मछलियों के  झुण्ड 
साथ साथ विचरण करती 
सरोवर में |
थोडा सा ही खतरे की आहट पाते ही 
तड़ितवेग से मुड जाती है,
छुप जाती है 
गहरे पानी के तल में |

कविता के भाव -भावना -विचार  भी 
आते हैं मीन की भांति झुण्ड में|
क्षुद्र कंकड़ की आहट से
तितर वितर हो जाते हैं राह से|
कपूर ज्यों उड़ जाते हैं सब भाव-विचार 
मानो मीन हीन हो गया है सरोवर
वैसे ही भाव -विचार शुन्य होते मन-सरोवर |
मीन की भांति मन मौजीहैं ये  भाव
खुद तैरकर आती सतह पर ,एकपल 
फैलाती है खुशबु फिर गायब अगली पल ||


कालीपद " प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित


23 comments:

  1. बहुत सही कहा आप ने भावनाए भी आती और छूप जाती है मछलियो के झुंड़ की तरह .... बहुत सुन्दर.. मेरी नई पोस्ट 'आमा' पर आप का स्वागत..

    ReplyDelete
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

    ReplyDelete
  3. सच कहा है ... भाव भी ऐसे ही तितर बितर हो जाते हैं अनेकों बार ...

    ReplyDelete
  4. मानव मन मीन जैसी
    वाह
    बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  5. सही कहा आपने भावनाएं भी आती है और चली जाती है मछली की झुण्ड की तरफ .........बहुत सुंदर रचना..... मेरे पोस्ट... माफ़ नहीं कर पाऊँगी... पर आपका स्वागत .

    ReplyDelete
  6. मछलियों से भावों की सुन्दर तुलना की है |

    ReplyDelete
  7. सुन्दर अतुलनीय तुलना

    ReplyDelete
  8. मानव मन पर मछली का बिम्ब बहुत ही बेहतरीन रचना...
    http://mauryareena.blogspot.in/
    :-)

    ReplyDelete
  9. बेहद सुन्दर रचना ...

    ReplyDelete
  10. behad lajbab prastuti .....aabhr sir ji

    ReplyDelete
  11. बहहुत खूबसूरत , कविता होती हैं मछलियों की तरह ..

    ReplyDelete
  12. भाव अनुभाव का मनो -विज्ञान सुन्दर तरीके से परोसा है इस प्रस्तुति में। आभार आपकी टिप्पणियों का प्रिंसिपल साहब।

    ReplyDelete
  13. बेहतरीन रचना

    ReplyDelete
  14. bilkul sahi udharan diya hai apne...hamara man aisa hi hota hai

    ReplyDelete