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| गूगल से साभार |
तीन पुत्र और दो कन्याओं के माता पिता
बूढ़े हो गए हैं ,लाठी के सहारे चलते हैं ,
सुबह शाम बड़ी बड़ी आखों में आंसू भरकर
दरवाज़े को अपलक ताकते रहते हैं l
हर सुबह उम्मीद का दीप अनुष्का जला जाती है
संध्या निर्दयता से उसे बुझा जाती है l
न कोई बेटा, न कोई बेटी को फुर्सत है
और न माँ बाप का खबर लेने कोई आते हैं l
पढ़कर बेटे गए कमाने विदेश
व्याहकर बेटियाँ गई साजन के देश l
सब हैं मस्त अपनी अपनी जिंदगी में
अनोपयोगी वस्तु का क्या महत्व है जिंदगी में ?
बुढाबूढी समझते थे उनका जीवन सफल है
बच्चों को पढ़ा लिखाकर पैरों पर खड़ा किया है l
यही होंगे उनके बुढापे का सहारा
जब वे होंगे शक्तिहीन बेसहारा l
इसे किस्मत कहे या दस्तूर नया जमाना
बूढ़े माँ बाप की तकलीफ किसी ने ना जाना l
जब होगये निर्बल ,न कर पाए श्रम
त्याग दिया मोह ,शरण लिया वृद्धाश्रम l
रचना : कालीपद "प्रसाद "
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