Sunday, 1 February 2015

रिश्तेदार सारे !**



जान जोखिम में डाले वो,,गर आप बचाना चाहो
इल्जाम आप पर लगाते,हर काम में टांग अडाते हो l
बात भले की करता हूँ,,शूल सी चुभती उनको
होंठों को सी ली मैंने,,कहीं उनका घाव गहरा न हो l
प्रतिकुल पूर्वाग्रह से ग्रसित है,, मेरे रिश्तेदार सारे
दोष तो मेरी ही होती है, ,बात कुछ भी हो l
खुद की नाकामी पर,, खुद से निराश है वह
कभी नहीं स्वीकारते,,कहते हैं आप जिम्मेदार हो l
औरों से सेवा कराना खूब आता है उनको 
खुद को समझते मालिक,बाकि नौकर सबको |



कालीपद "प्रसाद "

9 comments:

  1. व्यंग है ऐसे रिश्तेदाओं पर जो ये सब करते हैं ...

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  2. लेकिन -
    इनके बिना मै रह नहीं सकता इस बेदर्द ज़माने में...
    मेरी ये मज़बूरी मुझको याद दिलाने आ जाते हैं ...

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  3. सुंदर रचना।

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  4. आज के रिश्तों पर सटीक व्यंग...

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  5. Ek dam sateek vyang...sunder rachna

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  6. खुद की पता नहीं दूसरों को कहने वाले रिश्तेदार
    सच में संकुचित मानसिकता वाले होते है ! सटीक व्यंग्यरचना है !

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