Sunday, 31 December 2017

ग़ज़ल

अहबाब की नज़र
जिंदगी में है विरल मेरे निराले न्यारे’ दोस्त
हो गए नाराज़ देखो जो है’ मेरे प्यारे’ दोस्त |
एक जैसे सब नहीं बे-पीर सारी दोस्ती
किन्तु जिसने खाया’ धोखा किसको’ माने प्यारे’ दोस्त |
दोस्ती है नाम के, मैत्री निभाने में नहीं
वक्त मिलते ही शिकायत, और ताने मारे’ दोस्त |
कृष्ण अच्छा था सुदामा से निभाई दोस्ती
ऐसे’ इक आदित्य ज्यो हमको मिले दीदारे’ दोस्त |
संकटो में साथ दे ऐसा ही’ साथी चाहिए
जिंदगी भर दुःख के साथी है’ वो गम ख्वारे’ दोस्त |
एक या दो चार दिन की दोस्ती अच्छी नहीं
जीस्त भर ‘काली’ खरा यारी निभाने लारे’ दोस्त |
कालीपद 'प्रसाद'

5 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (01-01-2018) को "नया साल नयी आशा" (चर्चा अंक-2835) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    नववर्ष 2018 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  2. उत्कृष्ट व सराहनीय प्रस्तुति.........
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओ सहित नई पोस्ट पर आपका इंतजार .....

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  3. आपकी लिखी रचना  "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 2जनवरी2018 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. बहुत सुन्दर.....
    वाह!!!!

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  5. वाह
    बहुत सुंदर गजल
    सादर

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