Monday, 6 June 2016

हम अपने आज़ादी ..


हम अपनी आज़ादी का जश्न, बोलो अब कैसे मनाएँ
अमर शहीदों के बलिदान की, गाथा किसको सुनाएँ ?

भूखे रहे, गोली खाए वे, लड़ते लड़ते सब शहीद हुए
मजबूत आंग्ल डंडा भी, हौसला वीरों का तोड़ न पाये |
गोरे अंग्रेज तो चले गए, काले अंग्रेज को कौन भगाएँ
हम अपनी...

जालियाँवाला बाग़ को देखा, देखा नोआखाली के दंगे
साजिश थी सब विदेशी राज की, जात के थे वे फिरंगे
दलित-मुस्लिम पर क्रूरता कर, चरम पंथी कैसे इतराएँ
हम अपनी ...

हर चौथा आदमी भूखा है, करोडपति संसद में बैठे है
हर चौथा सांसद पर, भ्रष्टाचार का संगीन आरोप है
निराशा में डूबे देश है , आशा की ज्योति कौन जलाएँ
हम अपनी ...

हर पार्टी है निजी कम्पनी, अध्यक्ष का है मालिकाना हक़
कभी बाप, कभी बेटा, बीबी कभी, खानदान है अधिग्राहक
कम्पनी संभाले या देश संभाले, कौन इनको बतलाएँ
हम अपनी ....

हमारा देश अव्वल है, विश्व के सब देशों की सूचि में
किन्तु खेद है, अव्वल है यह, भ्रष्ट देशों की सूचि में
खेल ना जाने खेल के अध्यक्ष, मशाल कैसे जलाएँ
हम अपनी ...
गरीब को नहीं भरपेट भोजन, सड़ता है सब खाद्यान्न
करोड़ों टन की होती बर्बादी, है यह अकुशल प्रबंधन
भूख और कुपोषण के शिकार, किसके आगे गिढ़गिढ़ायें
हम अपनी ...
© कालीपद ‘प्रसाद’



Sunday, 29 May 2016

दोहे !



बारिश बिन धरती फटी, सुखे नदीतल ताल
धरणी जल दरिया सुखी, झरणा इक-सी हाल |

बादल जल सब पी गया, धरा का बुरा हाल
कण भर जल नल में नही, तृषित है बेहाल |

श्याम मेघ बरसो यहाँ, धरती से क्या बैर
अटल सत्य मानो इसे, हम तुमकु किये प्यार |

कहीं बाड़ें कहीं सुखा, सोचो मुक्ति उपाय
कम से कम जल वापरे, इ है उत्तम उपाय |

अतिशय गरमी आज है, चरम छोर पर ताप
खाली नल में मुहँ लगा, प्यासा करे संताप |

रवि है आग की भट्टी, बरस रहा है आग
झुलस रहा है आसमाँ, जलता जंगल बाग़  |

नहा कर वर्षा नीर से, फलता वृक्ष फलदार
फूल के हार से धरा, करती है श्रृंगार |

जल है तो सब जान है, जल बिन सब है मृत
मरने वालों की दवा, नीर ही है अमृत |


© कालीपद ‘प्रसाद”

Tuesday, 17 May 2016

रचना (आध्यात्मिक )


रचना !

कोरी आस्था मिलाकर, भ्रम का बुना जाल
पेट अपना भरते हैं, बेच नाम गोपाल |1|
पाप पुन्य का भय दिखा, ठगते है साधू संत 
जनता है भेढ़ बकरी, कसाई है महन्त |२|
सच्चे सन्त-बाबा विरल, सच्चे को करो नमन
बे-नकाम कर नक़ल को, कर सच का जयगान |३|
धर्म का मुख्य द्वार है, अहिंसा भरा जीवन
साधना से जगता है, सुप्त मन का चेतन |५४|
शुद्ध विचार करत दूर, मानस का सब रोग
ईर्ष्या, द्वेष, घृणा है, मन का कठोर रोग |५|

© कालीपद ‘प्रसाद’

Sunday, 15 May 2016

कविता





आस्था के बल पर गर्म, धर्म के सब दुकान
अन्धविश्वास बिकता है, सच्ची भक्ति बदनाम |1|

रूह चलाती काय को, यही आत्मा का गुण
काया में बसी आत्मा, खुद रूपहीन अगुण |२|

नाम अमृत को बांटो, भजो राम, हरिनाम
बेचकर राम नाम को, करो न, हरि बदनाम |३|

करता है सदा निराश, नकारात्मक सोच
भरोसा हो रब में तो, मिलेगी तुम्हे मोक्ष |४|
  
मानव जीवन में करे, यहाँ जो अच्छा काम
मिलती प्रशंसा यहाँ, जग में होता नाम |५|

© कालीपद ‘प्रसाद

Sunday, 8 May 2016

माँ

                                                     

                                      माँ

अचेत अबोध शिशु को, सीने से लागाकर तू माँ
बड़ा किया उसको अपने खून से, सींचकर तू माँl |

अंगुली थामकर क़दमों पर, चलना सिखाया मुझको 
इंसान बनाया मुझको,  संस्कार से सींचकर तू माँl |

जाग-जागकर रात को खुद, मुझको थपकी लगायी
मुझको सुलाती थी, लोरी के धुन सुना कर तू माँl |

पढने लिखने की प्रेरणा मुझको, तुझसे मिली माँ
आज मैं जो कुछ भी हूँ, उसका रचनाकार तू माँ |

तू ही ब्रह्मा, तू ही विष्णु, तू ही मेरा प्रथम गुरु 
तू जननी है मेरी अस्तित्व की, मेरे संस्कार तू माँ |

किया नाश मेरे दुर्गुणों का, तू ही शिवारूपा हो मेरी माँl
कभी प्यार से डांटकर, कभी बक्र भृकुटी दिखाकर तू माँ |

तेरे चरण-कमलों में, श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ मैं
जिंदगी के हर संकट में, तेरा हाथ रख मेरे सर पर तू माँl |


© कालीपद ‘प्रसाद’

Wednesday, 27 April 2016

अनावृष्टि !* गीतिका



जलाशय सूखे, नहर, कुएं सब सुख गए
खेतों में पानी नहीं, जमीन में दरारे पड गए ||1||
दैवी प्रकोप है या, है यह प्रकृति का रोष
स्वार्थी बने मानव, दिल में दरार पड़ गए ||२||
बूंद बूंद पानी के लिए, खगवृन्द तरसते रहे
बिन पानी सबके प्राण, एक साथ निकल गए ||३||
सुखा पीड़ित घूँट घूँट पानी के लिए तरसते रहे
लाखों लीटर पानी, एक क्रिकेट मैंदान पी गए ||४|
‘प्रसाद’ कहे सुनो नेता, जनता को ना यूँ मारो
तुम्हारे खेल कूद, जनता पर भारी पड गए ||५||

कालीपद ‘प्रसाद’
© सर्वाधिकार सुरक्षित 

Thursday, 21 April 2016

मेरी प्रकाशित किताबें




   मित्रों ,
        मेरे दो काव्य संग्रह अब बाज़ार में उपलब्ध हैं l प्रथम काव्य संग्रह का शीर्षक है “काव्य सौरभ” |.यह संग्रह प्रति दिन घट रहे घटनाएँ जो हम देखते है, सुनते हैं जैसे सामाजिक ,राजनैतिक, आध्यात्मिक, भ्रष्टाचार,व्याभिचार इत्यादि विषयों पर आधारित है| इसमें प्रेमाभिव्यक्ति है,घृणा है, व्यंग है, भाव है, भक्ति है ,प्रार्थना है |












       

        द्वितीय काव्य संग्रह है “अँधेरे से उजाले की ओर “| जैसा की इसका नाम है यह एक प्रेरणा दायक रचना है | इसमें तीन भाग हैं| प्रथम भाग युवावों के लिए है ,दूसरा भाग प्रौड़ केलिए और तीसरा भाग वृद्ध एवं आध्यात्मिक तत्त्व में रूचि रखने वालों के लिए है परन्तु सभी लोग तीनों भागों का भरपूर आनन्द ले सकते हैं |

               ये दोनों पुस्तके पुणे {महाराष्ट्र } और जयपुर {राजस्थान} के “CROSS WORD “ बुक स्टोर , http://www.bookganga.com/eBooks/Books/details/4921894805939991869?BookName=Kavya-Sourabha and http://www.amazon.in/dp/938431241X/ref=cm_sw_r_fa_dp_ksDRwb0Q83G8J   में उपलब्ध है | पुस्तक अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे इसी दृष्टि से कीमत कम राखी गई है | प्रत्येक की कीमत केवल ९५/- रू है|

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कालीपद ‘प्रसाद’
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