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| चित्र गूगल से साभार |
शाश्वत है यह प्रश्न
जिज्ञासा है सनातन
“मैं “हूँ कौन इस धरा पर
संयोग हूँ,वियोग हूँ या विघटन ?
संयोग पञ्च तत्वों का
है मेरा उत्पत्ति का कारण
जब होता वियोग इनका
होता है मेरा विघटन |
‘मैं’ भौतिक पदार्थों का योग हूँ
शायद मैं भौतिक पदार्थ हूँ
पदार्थों का सूक्ष्मतम कण
‘मैं ‘ उदासीन परमाणु हूँ |
हाँ मैं परमाणु हूँ ,क्योकि
मुझमे शक्ति केंद्र आशा है (धनात्मक प्रोटोन
)
मुझ में उतना ही निराशा है (ऋणात्मक
इलेक्ट्रान )
सम शक्ति आशा निराशा करती है मुझे उदासीन
(न्यूट्रल न्यूट्रान)|
होता है विस्फोट मुझ में तब
जब जंग करती आशा निराशा
विजयी होती है कोई एक जो प्रबल,
आशा हो या फिर निराशा |
अहम् से अहंकार का अस्तित्व है
अहम् है ‘मैं’ का भी अस्तित्व आलय
कौन सा मेरा अस्तित्व है
कौन सा है मेरा विलय ?
“मैं “ माया मोह ,राग द्वेष से परे
“ब्रह्म” हूँ
इनके जाल में फंसकर तड़पती मछली हूँ
रिश्ते नाते ,कुटूम्ब का जाल बिछा है
इसमें फंसकर अपना अस्तित्व भूल जाता हूँ |
अज्ञ-विज्ञ-विज्ञान के ज्ञाता
सब मानते हैं ,कोई है विधाता
मूर्त हो या सूक्ष्म से सूक्ष्मतम रूप
मानु क्या हिग्स कण को या मानु विश्वरूप ?
हिग्स कण से भी सूक्ष्म कण है
क्या मैं वो सूक्ष्मतम कण हूँ ?
हूँ मैं अदृश्य ,नाम मात्र अस्तित्व शायद
शक्ति रूप हूँ, हिग्स कण में निहित हूँ !
फिर भी मैं ’ब्रह्मरूप “की तलाश में
हूँ
इस जग में आकर मैं भटका हुआ हूँ
ज्ञानी गुणी दोस्त मेरे ,मुझे बता देना
कहाँ है मेरा अपना घर ,मैं कौन हूँ ?
कालीपद "प्रसाद"
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