Friday, 12 September 2014

दिल की बातें ***






वे ज़ख्म देते हैं  ,मैं  मुस्कुराता हूँ 
वे खुश होते हैं ,मैं रिश्ता निभाता हूँ |
सभी रिस्ते गए थे टूट बहुत पहले 
रिवाजों का ही" ढोए बोझ जाता हूँ |
मुसीबत में लोग गधे को बाप कहते है 
इसी उम्मीद से गधे की जिंदगी जी रहा हूँ |
किस्मत कहते हैं किसको ,मुझे नहीं पता
मैं तो अपना कर्म का फल भोग रहा हूँ |
शब्द के अथाह सागर में गोता लगाता हूँ
मन पाखी को भाता है शब्द वही कहता हूँ | 
पूजता हूँ ईश्वर ,अल्लाह ,पाने उनके 'प्रसाद '
आजतक किसने पाया ,उसको ही ढूंढ़ रहा हूँ | 


(c) कालीपद "प्रसाद "

Wednesday, 10 September 2014

रब का इशारा **


                                    
चित्र गूगल से साभार


पहले केदार नाथ में प्रलय ,अब काश्मीर में प्रलय
चेत जाओ इंसान ,अब संभालो पर्वतराज हिमालय !

ईश्वर नाराज़ है या प्रकृति ने दिया यह निर्मम दण्ड
बीते वर्ष में भी आई थी यह देव भूमि उत्ताराखंड !

सिन्धु तट जलमग्न होता  है ,तीव्र समुद्री तूफान से
हिमालय पर प्रलय आ रहा है ,क्या दैवीय प्रकोप से ?

सोचो इंसान करो कुछ  उपाय, बंद करो अब शोषण
अत्याचार का करो अंत ,बंद करो धरती का दोहन !

शायद यह है सुप्त संकेत ,भविश्य के बड़े आपदा का
जलमग्न होगा पूरा देश ,काम ना आयगा कोई प्रार्थना !

पाक काश्मीर ,हिन्द काश्मीर ,समझो रब का इशारा 
सबसे है नाराज़ रब ,उसने न माना कोई सीमा रेखा !

डूब गया पूरा काश्मीर ,मरे न जाने कितना इंसान 
कोई न जाने पीड़ित में कौन हिन्दू ,कौन मुसलमान !

(C)   कालीपद "प्रसाद "



Friday, 5 September 2014

गुरु कैसा हो !


शिक्षक दिवस पर आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं !


गुणगान तो होती है
गुरु की महिमा पर ,
उनकी उदारता ,ज्ञान गंभीर 
सहानुभूति और असीम प्यार पर |

गुरु का ह्रदय संकुचित न हो 
जिसमें धनी निर्धन में फर्क न हो
जात पात का भेद भाव ना करे आचार्य 
एकलव्य के साथ जैसा किया था द्रोणाचार्य |

कुम्हार वही है जो 
गीली मिट्टी को प्रयोज्य आकार दे ,
शिक्षक वही है जो 
निर्मल ह्रदय से 
बच्चों के निर्मल ह्रदय पर 
सार्थक चित्र खींच दें ,
इमानदारी से 
सफल जीवन यात्रा का
 रहस्य बता दें 
खुद आगे चलकर 
पगडण्डी का नींव डाल दें |

परिवर्तन के इस युग में 
विश्वबाजार के दौर में 
आजीविका का प्रश्न भी है !
समाज ,सरकार केवल 
गुरु से अपेक्षाएं न करे 
उनकी वाजिब 
आवश्यकताओं की पूर्ति करें |
ईमानदार होगा तब भारत 
भ्रष्टाचार से होगा मुक्त 
गुरु होगा पूज्य हर घर में 
भारत होगा पूज्य फिर विश्व में |

कालीपद "प्रसाद"
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Tuesday, 2 September 2014

गुस्सा

गुस्सा  न तो दीमक है 
न वह शीत ज्वर है ,
यह तो सैलाब है .........
जो तोड़ देता है वुद्धि का बांध 
उखाड़ देता है विवेक का जड़ 
मनुष्य को बना देता है हिंस्र पशु 
तोड देता है रिश्ते नाते का बंधन सारे 
सब को कर देता  है निमग्न 
बाड  से जैसे नदी के दो किनारे |

मुँह बन जाता है अक्षय तरकश 
निकलता है तीक्ष्ण शब्द वाण 
भेदता है विपक्ष के ह्रदय पटल 
लेने को आतुर उसका प्राण 
किन्तु जब थमता है गुस्सा का ज्वर 
मुँह से निकले शब्द वाण  का 
सोच नहीं पाता  है कोई उत्तर 
पश्चाताप का आंसू चाहे भर दे नदी सारे 
नहीं भर पाता है जो घाव दिए हैं गहरे |

कालीपद "प्रसाद "
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Saturday, 30 August 2014

हमारे रक्षक हैं पेड़ !



                                                


एक थप्पड़ पड़ता है जब तुम्हे
आंसू तुम्हारा बह निकलता है ,
कुल्हाड़ी का एक घाव से पेड़ भी
सिसक सिसक कर रोता है |

तुम तो चिल्लाकर व्याथा अपनी
बढाकर ,सब को बता देते हो,
वाक् शक्तिहीन ,मूक है पेड़
उनकी व्याथा का तुम्हे अहसास हो

चुपचाप पीड़ा सह लेता है वह
कभी  शिकायत नहीं करता है,
आँधी तूफान अनावृष्टि में वह
हम सबके जीवन का रक्षक हैं |

जीवन रक्षक हैं, पालक हैं पेड़
सारे जग का कल्याण करता है ,
 स्वार्थ में पड़कर मुर्ख इंसान
पेड़ों को दुश्मन समझ रहा है |

तपती धुप हो या मुसलाधार वर्षा
पशु पक्षी पथिक को आश्रय देता है ,
भू -क्षरण और वायु प्रदुषण रोककर
पर्यावरण  को   शुद्ध   बनाता   है |

शहर  छोड़कर अब  फैलने लगा है
कांक्रीट का जंगल हर क़स्बा हर गाँव
एक दिन ऐसा आएगा ,जब तरसेंगे
मानव पाने को वृक्ष का शीतल छाँव |

धरती  लगती  है   सुन्दर  दुल्हन
ओड़कर सर पर हरा दुपट्टा
निर्दयी बनकर ना छीनो धरती से
अवनी माँ की लाज की दुपट्टा |

आओ करे प्रण,सब मिलकर आज
करेंगे रक्षा धरती की, हरयाली की
अपने जीवनकाल में रोपकर दस पौधे
अहसान उतारेंगे हम धरती माँ की |

कालीपद "प्रसाद "
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Saturday, 23 August 2014

क्या कहते हैं ये सपने ?



                                                                                      
गूगल से साभार



जब भी खो जाता हूँ
मैं नींद के आगोश में
सपने आकर चले जाते हैं
एक के बाद एक कतार में ,
किन्तु मुझे नहीं पता
क्या कहते हैं ये सपने |
बचपन बीता खेलकूद में
बेफिक्र मद मस्ती में
बिना पंख परवाज़ भरा
परियों के संगत में मैंने
किन्तु मुझे नहीं पता
क्या कहते हैं ये सपने |
उड़कर बैठे पेडों के ऊपर
नदी नालों को किया पार
मधुपान किया फुल फुल में
सैर किया हिमालय शिखर में
किन्तु मुझे नहीं पता कुछ
क्या कहते हैं ये सपने |
उम्र की सीडी ज्यों चडते गए
कुछ नए सपने आये और गए
यादों में कुछ ऐसा बसा नहीं
कुछ छाप नहीं छोड़ा जिंदगी में
इसीलिए मुझे नहीं पता कुछ
क्या कहते हैं ये सपने |
जिंदगी के इस पढाव में
बार बार क्यों आता है एक सपना
जाता हूँ प्रवास में मैं हरबार
खोकर आता हूँ सब सामान अपना
किन्तु कभी कुछ समझने ना दिया
क्या कहना चाहता है यह सपना |
ट्रेन से जाऊं या बस से जाऊं मैं
या जाऊं हवाई जहाज से ,
खो जाता है मेरा लगेज सब
मिले ना सामान,खोजूं चाहे लगन से|
कभी खो जाता है जुते मोज़े
कभी खो जाता है पेंट शर्ट,
कभी खो जाता है सब सामान
लौटता  हूँ घर खाली हाथ |
सपने सब पराये,नहीं हुए कोई अपने
नहीं पता मुझे, क्या कहते ये सपने|
लग रहा है मुझे भी अब
छुट रहा है कुछ ,इस जिंदगी में
उसको बताने केलिए आतुर है सपने,पर  
आ नहीं पाते ,रात कटती है जागरण में
इसीलिए  मुझे नहीं पता
क्या कहते हैं ये सपने |

कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, 19 August 2014

मैं-धरा पर ...




चित्र गूगल से साभार


शाश्वत  है यह प्रश्न
जिज्ञासा है सनातन
“मैं “हूँ कौन इस धरा पर
संयोग हूँ,वियोग हूँ या विघटन ?

संयोग पञ्च तत्वों का
है मेरा उत्पत्ति का कारण
जब होता वियोग इनका
होता है मेरा विघटन |
‘मैं’ भौतिक पदार्थों का योग हूँ
शायद मैं भौतिक पदार्थ हूँ
पदार्थों का सूक्ष्मतम कण
‘मैं ‘ उदासीन परमाणु हूँ |

हाँ मैं परमाणु हूँ ,क्योकि
मुझमे शक्ति केंद्र आशा है (धनात्मक प्रोटोन )
मुझ में उतना ही निराशा है (ऋणात्मक इलेक्ट्रान )
सम शक्ति आशा निराशा करती है मुझे उदासीन (न्यूट्रल न्यूट्रान)|

होता है विस्फोट मुझ में तब
जब जंग करती आशा निराशा
विजयी होती है कोई एक जो प्रबल,   
आशा हो या फिर निराशा |

अहम् से अहंकार का अस्तित्व है
अहम् है ‘मैं’ का भी अस्तित्व आलय
कौन सा मेरा अस्तित्व है
कौन सा है मेरा विलय ?

“मैं “ माया मोह ,राग द्वेष से परे “ब्रह्म” हूँ
इनके जाल में फंसकर तड़पती मछली हूँ
रिश्ते नाते ,कुटूम्ब का जाल बिछा है
इसमें फंसकर अपना अस्तित्व भूल जाता हूँ |

अज्ञ-विज्ञ-विज्ञान के ज्ञाता
सब मानते हैं ,कोई है विधाता
मूर्त हो या सूक्ष्म से सूक्ष्मतम रूप
मानु क्या हिग्स कण को या मानु विश्वरूप ?

हिग्स कण से भी सूक्ष्म कण है
क्या मैं वो सूक्ष्मतम कण हूँ ?
हूँ मैं अदृश्य ,नाम मात्र अस्तित्व शायद
शक्ति रूप हूँ, हिग्स कण में निहित हूँ !

फिर भी मैं ’ब्रह्मरूप “की तलाश में हूँ 
इस जग में आकर मैं भटका हुआ हूँ
ज्ञानी गुणी दोस्त मेरे ,मुझे बता देना
कहाँ है मेरा अपना घर ,मैं कौन हूँ ?

कालीपद "प्रसाद"
सर्वाधिकार सुरक्षित