Sunday, 13 January 2013

कुछ पता नहीं !!!


मैं जनम लूँगा
धरती पर आऊंगा
कभी सोचा भी नहीं।

कैसे सोचता मैं?
मेरी तो चेतना  थी ही नहीं
नहीं पता, मेरी वजूद भी थी या नहीं।

कब कैसे एक ममतामयी
देवी के गर्भ  में आया
कब तक रहा, कुछ पता नहीं।

उसकी गर्भ से कब
धरती पर भूमिष्ट हुआ
या किसी के हाथ ने थाम  लिया ,पता नहीं।

आँखे जब खोली,
अँधेरा नहीं ,उजाला था
आँखे चौंधिया गई ,कुछ दिखा नहीं।

कान में कुछ आवाज
कुछ कोलाहल सुनाई पड़ी
किसी की आवाज ,या शंखध्वनि , पता नहीं।




डर  से जब रोने लगा,
तब कोई कोमल स्पर्श मेरे माथे पर हुआ
किसी का होंठ था या कुछ और , पता नहीं।





भूख से मैं तड़फ रहा था
कुछ नहीं मैं कह पा रहा था
मुँह में कैसे अमृतधारा आई ,कुछ मुझे पता नहीं।

समय बीतता गया,मैं बढ़ता गया 
नजर कभी इधर, कभी उधर
कभी कहीं टिक जाती  ,क्या देखता ,पता नहीं।

एक नारी हरदम मुझे
सीने  से लगा के रखी
दूध पिलाती ,लाड़ करती,कौन थी वह, पता नहीं।

उसका हँसना ,उसका बोलना
मुझे अब समझ में आने लगा
चाहा, कुछ बोलूं ,पर बोल कुछ मैं पाता नहीं।

बोलो "माँ .........". बोलो "माँ  ........."
बार बार वह कहती मुझ से
बोला मैंने "माँ"  तो आँसू उसकी रुकी नहीं।

आँसू  उसकी बहती गई
पागल हो वह मुझे चूमती गई
प्यार था वह ,क्या था ,मुझे कुछ पता नहीं।

फिर जब मैं  बोला" माँ ...माँ ...माँ ...."
हाथ के झूले में झुलाकर मुझे
बोली "हाँ मैं तेरी माँ " और माँ उसकी पहचान बन गई।

माँ ने सिखाया "बाबा "बोलना
गोद में डालकर कहा " यह बाबा है तुम्हारा "
माँ ,बाबा कैसा रिश्ता ? मुझे कुछ पता नहीं।

                                                               (  आगे अगली पोस्ट में )


कालीपद "प्रसाद"
© सर्वाधिकार सुरक्षित



































27 comments:

  1. बढ़िया भाव |
    शुभकामनायें ||

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति सोमवार के चर्चा मंच पर ।। मंगल मंगल मकरसंक्रांति ।।

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  3. बहुत सुंदर भाव से लिखी खूबसरत रचना,,,बधाई,काली प्रसाद जी,,,

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  4. बेहद सुन्दर....आगे की प्रतीक्षा में..
    मकर संक्रांति की शुभकामनाएं...
    सादर
    अनु

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  5. कुछ अलग सी पोस्ट, अच्छी लगी ..............

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  6. आप सबको मकर संक्रांति की शुभकामनाएं

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  7. बहुत सुन्दर रचना, प्रतीक्षा है अग्रिम पोस्ट की ...लोहिड़ी व मकर संक्रांति पर्व की ढेरों शुभकामनाएँ

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    मकर संक्रान्ति के अवसर पर
    उत्तरायणी की बहुत-बहुत बधाई!

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  9. मकर संक्रान्ति की शुभ कामनाएँ !

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  10. बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति ! बालक जब संसार में प्रवेश करता है अबोध ही होता है ! हर वास्तु हर रिश्ते से उसका परिचय माँ ही कराती है और बालक की हर छोटी से छोटी बात पर माँ ही बलि-बलि जाती है ! बहुत सुन्दर रचना ! मकर संक्रांति एवं लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएं !

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  11. बच्चे की जुबानी -- या बचपन की कहानी .. कुछ पता नहीं ... बहुत ही सुन्दर और अलग रचना ...सादर

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  12. ,सशक्त अभिव्यक्ति अर्थ और विचार की
    . संक्रांति की मुबारकबाद .आपकी सद्य टिप्पणियों के लिए

    आभार .

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  13. बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  14. मर्म को उकेरती सारगर्भित रचना...

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  15. पहली बार आना हुआ आपके इस ब्लॉग पर। सुन्दर अभिव्यक्तियाँ मिलीं।
    सादर
    मधुरेश

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  16. मर्म को उकेरती सारगर्भित रचना.बहुत बहुत बधाई .

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  17. माँ को नमन ...इंतज़ार रहेगा अगली कड़ी का :)

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  18. पहली बार आना हुआ आपके ब्लॉग पर,बहुत ही सुंदर कविता,माँ नमन तुम्हारा जिसने हमे जन्म दिया।
    भूली-बिसरी यादें
    वेब मीडिया

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  19. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...मकर संक्रान्ति की शुभ कामनाएँ !

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  20. बहुत सही ....सार्थक रचना..

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  21. आप सबको बहुत बहुत धन्यवाद,.इसका दूसरा भाग में आपका स्वागत है.

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  22. अच्छी भावपूर्ण रचना के लिए आभार !!

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  23. सुंदर एवं भावपूर्ण रचना...

    आप की ये रचना 12-04-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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  24. भावपूर्ण रचना के लिए आभार!इंतज़ार रहेगा अगली कड़ी का .........

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  25. माँ की यीद दिलाती कविता......बधाई

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