Thursday, 14 November 2013

लोकतंत्र -स्तम्भ

                                              
न्यायपालिका


तीन स्तम्भ हैं भारत महान लोकतंत्र का
संसद ,न्यायपालिका और कार्यपालिका |

न्यायपालिका ,कार्यपालिका को बना दिया बेअसर
संसद स्वयंभू- स्व-घोषित, राज -संसद बनकर |

"सांसद विधाता हैं  "हुआ हुक्म ज़ारी संसद में
"सांसद आजाद हैं " बंधे नहीं कानूनी ज़ंजीर में|

न्यायपालिका का आदेश मान्य है जनता के लिए
सांसद तो विधाता है,कोर्ट का फैसला नहीं उनके लिए |

कहने के लिये हैं "कानून के ऊपर कोई नहीं "
हकीकत में,भारत में सांसद से बड़ा कोई नहीं |

मंत्री अगर अपनी मनमानी न कर पाए
किस बात का मंत्री वह ,खुद समझ न पाए |

घपला करना, कमीशन खाना, यही तो धर्म है
अगले चुनाव का खर्च जुटाना,यही तो एक काम है |

इनको मंजूर नहीं,इनके घपले पर ऊँगली उठाय कोई
जनता हो ,मीडिया हो ,न्यायालय हो या हो और कोई |

घमंड है उनको ,कानून बनाकर ,बना सकते है सबको निकम्मा
आदेश है उनका "प्रसाद "सर झुककर मानो ,कभी न सर उठाना |


शब्दार्थ : राज -संसद =राजसभा जहाँ राजा खुद न्याय करता है |न्यायाधीश को निष्क्रिय बना देता है |

रचनाकार
कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित

26 comments:

  1. शुभप्रभात
    लेखनी कितनी भी धारदार हो
    इन गूंगे बहरे पर असर नहीं हो रही
    सादर

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार को (14-11-2013) ऐसा होता तो ऐसा होता ( चर्चा - 1429 ) "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चाचा नेहरू के जन्मदिवस बालदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आपका आभार डॉ रूपचन्द्र शास्त्री जी !

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  3. आज के हकीकत को वयां करती सुंदर रचना प्रस्तुति !!

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  4. चौथा स्तंभ भी है एक
    अलग कहीं खड़ा हुआ !

    सुंदर !

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  5. आदरणीय सर , मैं भी श्री विभा जी की बात से सहमत हूँ , असर डालता बढ़िया लेख , धन्यवाद
    सूत्र आपके लिए अगर समय मिले तो --: श्री राम तेरे कितने रूप , लेकिन ?
    * जै श्री हरि: *

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  6. देश की असलियत से रूबरू कराती रचना ...
    सटीक ...

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  7. बहुत सुन्दर.

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  8. समसामयिक रचना |

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  9. सटीक भावाभिव्यक्ति ...

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  10. बहुत सुंदर

    मित्रों कुछ व्यस्तता के चलते मैं काफी समय से
    ब्लाग पर नहीं आ पाया। अब कोशिश होगी कि
    यहां बना रहूं।
    आभार

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  11. सुंदर प्रस्तुति ..सादर

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  12. बहुत ही सटीक बाते कही है रचना में,
    बहुत खूब !

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  13. वाह! क्या खूब..

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  14. फिर भी सांसदों को जनता के सामने झुकना होता है अब जनता की बारी है कि वह अपनी शक्ति को कम न आंके...

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  15. सामयिक प्रस्तुति

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  16. बहुत सुन्दर रचना.

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  17. सटीक व सामयिक रचना, शुभकामनाएं.

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  18. सांसद छुट्टा सांड है जनता निरीह गाय ,

    सांसद मूषक राज है लोकतंत्र को खाय ,

    निसिदिन कुतर कुतर के खाय ,

    भैया कुतर कुतर के खाय ,

    बिन खाय रहा न जाय ,

    खुट्टल दांत होई जाय।

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  19. अच्छी साहस पूर्ण प्रस्तुति !

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