Wednesday, 19 October 2016

करवा चौथ

करवा चौथ

समाज में कुछ है आस्था
उससे ज्यादा प्रचलित है व्यवस्था,
प्रगतिशील वैज्ञानिक युग में
ज्ञान का विस्फोट हो चुका है
उसकी रौशनी में
छटपटा रही है कुछ आस्था
तोड़ना चाहती है पुरानी व्यावस्था | 
मानते हैं सब कोई ..,
कुछ रस्मे, रीति-रिवाजें
मुमूर्ष साँसे गिन रही हैं,
फिर भी उन्हें जंजीर में
जकड़ी हुई है जर्जर व्यवस्था |
करवा चौथ ...
प्रिया का प्रेम प्रदर्शन
कीमती उपहार देते हैं साजन,
शायद यही है
इस त्यौहार का जीवित रहने का कारण |
क्योकि
मानते हैं ज्ञानी, गुणी, ऋषि, मुनि
विधाता ने लिख दिया आयु
निश्चित कर दिया स्वांस की वायु
यह अज्ञेय, अपरिवर्तनीय है
जन्म और मृत्यु की निश्चित दुरी है |
पत्नी की सुनकर विनती
क्या विधाता कर देता
पति की लम्बी आयु, और  
दुबारा लिखता है उसकी परमायु ?  
मन, विवेक को यकीं नहीं,
पर मजबूर हैं, पत्नियाँ रस्मे निभाती हैं
दिन बार भूखी रहती है 
छलनी से चाँद देखकर ही खाती है 
न चाहते हुए 
खुद को, विवेक को छलती है 
यही समाज की अंधी व्यवस्था है |

@ कालीपद ‘प्रसाद’

1 comment:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (21-10-2016) के चर्चा मंच "करवा चौथ की फि‍र राम-राम" {चर्चा अंक- 2502} पर भी होगी!
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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