Friday, 3 March 2017

ग़ज़ल

गीतिका
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बेवफा रिश्ते निभाने आ गया
आज मुझको आजमाने आ गया |
भूला बिसरा गीत यादों में बसा
दोस्त उसको गुनगुनाने आ गया |
कौन है जो यूँ ही दिल में आ बसा
अजनबी है बेठिकाने आ गया |
आज सुनलो बात मेरी बावफा
मैं तुहारे ही निशाने आ गया |
दिल में जो थी तिक्तता वर्षों दबी
द्वेष कड़वाहट सुनाने आगया |
याद कर फ़रियाद सब वो भूत का
शर्त पर मुझको झुकाने आ गया |
भूलकर अपमान जो झेला कभी
वो बडप्पन अब जताने आ गया |
क्या हुआ अद्भुत , बजा क्या झुनझुना
आज वो हमको मनाने आ गया |
हारा है हरबार जब भी वह लड़ा
अब सबक हमको सिखाने आ गया |
कालीपद ‘प्रसाद’

9 comments:

  1. सुंदर रचना

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-03-2017) को
    "खिलते हैं फूल रेगिस्तान में" (चर्चा अंक-2602)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 06 मार्च 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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