Sunday, 18 November 2018

ईश्वर को पत्र

वर्तमान परिस्थिति पर शिकायत किस् से करें ? सो ईश्वर को पत्र लिख दिया | ईश्वर को पत्र हे ईश्वर ! संसार से जो निराश होते हैं वह तेरे द्वार आते हैं | हम भी निराश हैं, जनता से, सरकार से | तू निर्विकार है, निराकार है, अदृश्य अमूर्त है| फिर भी भ्रमित लोग अपनी इच्छा अनुसार कल्पना से तेरी मूर्ति बनाकर, आस्था की दुहाई देकर आम जनता, सरकार, यहां तक की अदालत को भी मजबूर कर देते हैं | आस्था के चरमपंथी अदालत के आदेश को भी महत्व नहीं देते हैं| अब तू बता हम न्याय के लिए किसके पास जाएं ? तू अपने मन की बात बता तुझे,मन का कोमल मंदिर चाहिए या कंकड़ पत्थर से सजे महल चाहिए ? गरीब जनता जी भर पुकारती तुझे नगण्य फल फूल से पूजती तुझे तुझे यह अश्रु सिक्त अर्पण चाहिए या आलीशान मंदिर के सुगंधित छप्पन भोग चाहिए ? दीन हीन बेसहारा जो तेरे सहारे की आस में बैठे हैं , तू उनके साथ जमीन पर बैठेगा ? या मुट्ठी भर धनी, पुजारी साधु,संत के आडंबर से भरपुर रत्न सिंहासन पर विरेजेगा ? तुझे यहां छप्पन भोग मिलेगा बाहर अश्रु जल और शबरी का जूठा बेर मिलेगा | तू ही बता, तुझे क्या पसंद है? कहते हैं जो लेता है वह छोटा होता है, जो देता है वह बड़ा होता है, हर पूजन में जो लेता है तू उसे धनी बना देता है और जो भक्ति से तुझे देता है उसे तू गरीबी का दंड देता है | यह कैसा तेरा न्याय ? तू अवतारी है, तुझे क्या धनी और राजघराना ही पसंद है? रानी कौशल्या के राम बना राजकन्या देवकी के कृष्ण बना तू बता तू शंबूक क्यों नहीं बना ? सुदामा क्यों नहीं बना ? गरीब, निम्न वर्ग का उद्धार हो जाता| तू भगवान है, तू जवाब नहीं देगा मुझे पता है | मुझे यह भी पता है कि तू राम कृष्ण बना नहीं तुझे बनाया गया है | हिंसा द्वेष स्वार्थ भेद-भाव की दुर्नीति तेरे ही आड़ में सब का अंजाम दिया गया है | जानता हूं पत्र का उत्तर नहीं मिलेगा कुछ चिढ़ेगा ,मुस्कुराएगा फिर संसार ऐसा ही चलता रहेगा | कालीपद ‘प्रसाद'

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (19-11-2018) को "महकता चमन है" (चर्चा अंक-3160) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  2. 'ईश्वर को पत्र ' काली प्रसाद जी लिखते हैं :ज़वाब कोई भी दे सकता है क्योंकि वह सबमें हैं आकार निराकार सगुण - निर्गुण ,राजा -रंक ,दुर्योधन -युधिष्ठिर भी वही है। राम -रावण भी सब कुछ जो दीखता है उसी की लीला का विस्तार है।

    सगुण मीठो खाँड़ सो ,निर्गुण कड़वो नीम ,

    जाको गुरु जो परस दे ,ताहि प्रेम सो जीम।

    जाकी रही भावना जैसी,

    प्रभ मूरत देखि तिन तैसी।

    जिन खोजा तिन पाइयाँ ,गहरे पानी पैठ।

    जो बौरी डूबन डरी , रही किनारे बैठ।

    असली सवाल है आस्था ,श्रद्धा ,प्रेम। क्या हम उसे प्रेम करते हैं जानते हैं उसे या सुना सुनाया दोहराते हैं ?
    साँच कहूँ सुन लेओ सभै ,

    जिन प्रेम कियो ,तिन ही प्रभ पायो।
    vigyanpaksh.blogspot.com
    veerujan.blogspot.com
    veeruji05.blogspot.com

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  3. हर शब्‍द बहुत कुछ कहता हुआ, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति के लिये बधाई के साथ शुभकामनायें ।

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