मेरे विचार और अनुभुतियों की गुलिस्ताँ में आपका स्वागत है |.... ना छंदों का ज्ञान,न गीत, न ग़ज़ल लिखता हूँ ....दिल-आकाश-उपज,अभ्रों को शब्द देता हूँ ........................................................................ ............. इसे जो सुन सके निपुण वो हैं प्रवुद्ध ज्ञानी...... विनम्र हो झुककर उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ |
Friday, 8 July 2016
Sunday, 3 July 2016
मुक्तक
इंसानी नस्ल नष्ट न हो, कोशिश होनी चाहिए
जल, जीवन, जंगल सह, एक नई धरती चाहिए
अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों की, कोशिशें रंग लायगी
अरबों ग्रह में से एक ऐसी, धरती होनी चाहिए |
जल, जीवन, जंगल सह, एक नई धरती चाहिए
अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों की, कोशिशें रंग लायगी
अरबों ग्रह में से एक ऐसी, धरती होनी चाहिए |
© कालीपद ‘प्रसाद’
Friday, 1 July 2016
ग़ज़ल
दिल के धड़कनों को कम करना चाहता हूँ
आज घटित घटना को विसरना चाहता हूँ |
जीवन में घटी है कुछ घटनाएँ ऐसी
सूखे घावों को नहीं कुतरना चाहता हूँ
|
यादों की बारातें आती है तन्हाई में
तन्हाई दूर मैं करना चाहता हूँ |
नुकिले पत्थर हैं कदम कदम पर लेकिन
मखमल के विस्तर में नहीं मरना चाहता
हूँ |
जिंदगी का सफ़र तो इतना भी आसान नहीं
सदा सफ़र में धीरज धरना चाहता हूँ |
रब के ‘प्रसाद’ से जिंदगी चलती जाए
उनको झुककर सजदा करना चाहता हूँ |
कालीपद ‘प्रसाद’
©
Tuesday, 21 June 2016
ग़ज़ल
बह्र: २१२२ २१२२ २१२
सारी सारी रात-जग जिन के लिए
पूछते वे जागरण किन के लिए |1|
चाँद तारों तो झुले हैं रात में
एक सूरज को रखा दिन के लिए |२|
आसान नहीं भूलना यूँ भूत को
आज तक तो मोह है इन के लिए |३|
रात भर आँसू कभी थमती नहीं
अश्रु जल यूँ लुडकते किन के लिए|४ |
वो सुखी हैं या दुखी किन को पता
फूल जंगल में खिले किन के लिए |५|
जानते थे हम जुदा होंगे कभी
क्या जतन करते कभी इन के लिए |६|
अब इन्हें संसार में आना नहीं
कौन रोये इस जहाँ इन के लिए |७|
वो कभी पीड़ा समझना चाहती
क्लेश हम पीते गए जिनके लिए |८|
कालीपद 'प्रसाद'
Thursday, 16 June 2016
दोहे !
पाप काटने के लिए, नहीं चढ़ाओ भेंट
शुद्ध सरल मन के बिना, मंज़ूर नहीं भेंट |११|
बिकता नहीं खुदा कभी, रुपये हो या माल
लोचन जल के बूंद दो, दर्शन करो कमाल |१२|
बढ़ते है पापी यहाँ, कौन करेगा नाश
हैं पौत्र रक्तबीज के, होयगा खुद विनाश |१३|
चढ़ा भेंट भगवान को, चाहते कटे पाप
घुस से कुछ होता नहीं, कटौती नहीं पाप |१४|
कर्म फल भुगतना यहीं, जानो यही विधान
क्षमा माँग सजदा करो, निष्फल होता दान |१५|
कालीपद'प्रसाद'
Sunday, 12 June 2016
तीन मुक्तक
तीन मुक्तक
जाति वादी भावना लेकर, मन्दिर में जो जाते
राजनीति करते मन्दिर में, भक्ति भूल वो जाते
हर काया में ईश्वर हैं, प्रत्येक के ह्रदय में
ईर्ष्या से ही मन मन्दिर, उनके निन्दित हो जाते |1|
राजनीति करते मन्दिर में, भक्ति भूल वो जाते
हर काया में ईश्वर हैं, प्रत्येक के ह्रदय में
ईर्ष्या से ही मन मन्दिर, उनके निन्दित हो जाते |1|
राजनयिक औरों के कन्धे पर से बन्दूक चलाता है
अपना विशेष गुप्त मिशन संदूकों में गोपन रखता है
जन हित में मन्दिर बनाने की, वायदा तो एक बहाना
खुद की रोजी रोटी का इन्तजाम, मन्दिर से करता है |२|
अपना विशेष गुप्त मिशन संदूकों में गोपन रखता है
जन हित में मन्दिर बनाने की, वायदा तो एक बहाना
खुद की रोजी रोटी का इन्तजाम, मन्दिर से करता है |२|
केवल पूजा पाठ को ही धर्म, मानते हैं जो लोग
अनभिज्ञ हैं अथाह आध्यात्म से, भ्रमित है वो लोग
आत्मा परमात्मा तो बसते है, अपने दिल के अन्दर
ध्यान मनन चिन्तन छोड़, बाहर ढूंढ़ते खुदा को लोग |३|
अनभिज्ञ हैं अथाह आध्यात्म से, भ्रमित है वो लोग
आत्मा परमात्मा तो बसते है, अपने दिल के अन्दर
ध्यान मनन चिन्तन छोड़, बाहर ढूंढ़ते खुदा को लोग |३|
कालीपद 'प्रसाद'
Monday, 6 June 2016
हम अपने आज़ादी ..
हम अपनी आज़ादी का जश्न, बोलो अब कैसे मनाएँ
अमर शहीदों के बलिदान की, गाथा किसको सुनाएँ ?
भूखे रहे, गोली खाए वे, लड़ते लड़ते सब शहीद हुए
मजबूत आंग्ल डंडा भी, हौसला वीरों का तोड़ न पाये |
गोरे अंग्रेज तो चले गए, काले अंग्रेज को कौन भगाएँ
हम अपनी...
जालियाँवाला बाग़ को देखा, देखा नोआखाली के दंगे
साजिश थी सब विदेशी राज की, जात के थे वे फिरंगे
दलित-मुस्लिम पर क्रूरता कर, चरम पंथी कैसे इतराएँ
हम अपनी ...
हर चौथा आदमी भूखा है, करोडपति संसद में बैठे है
हर चौथा सांसद पर, भ्रष्टाचार का संगीन आरोप है
निराशा में डूबे देश है , आशा की ज्योति कौन जलाएँ
हम अपनी ...
हर पार्टी है निजी कम्पनी, अध्यक्ष का है मालिकाना हक़
कभी बाप, कभी बेटा, बीबी कभी, खानदान है अधिग्राहक
कम्पनी संभाले या देश संभाले, कौन इनको बतलाएँ
हम अपनी ....
हमारा देश अव्वल है, विश्व के सब देशों की सूचि में
किन्तु खेद है, अव्वल है यह, भ्रष्ट देशों की सूचि में
खेल ना जाने खेल के अध्यक्ष, मशाल कैसे जलाएँ
हम अपनी ...
गरीब को नहीं भरपेट भोजन, सड़ता है सब खाद्यान्न
करोड़ों टन की होती बर्बादी, है यह अकुशल प्रबंधन
भूख और कुपोषण के शिकार, किसके आगे गिढ़गिढ़ायें
हम अपनी ...
© कालीपद ‘प्रसाद’
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