Friday, 14 August 2015

भारत महान !



                                     


देशों में एक देश है विशाल,है हमारा भारत महान
सुबह सुनाई दे मंदिर का घंटा,मस्जिद में अज़ान ;
जैसा पावन गीता है यहाँ,वैसा है बाइबिल कुरआन
देशों में एक देश है विशाल ,है हमारा भारत महान l

चर्च में होती प्रार्थना जब,द्वारा में गुरुग्रन्थ का पाठ
क्रिसमस हो या होली ईद ,मनाते सब मिलकर साथ
राम भजे रहीम को यहाँ ,रहीम पूजे कृष्ण भगवान
देशों में एक देश है विशाल ,है हमारा भारत महान l

हिन्दू ईसाई सिख पारसी ,जैन बुद्ध और मुसलमान
मिलकर मनाये हर त्यौहार,कोई न करे कोई व्यावधान
ऐसा प्यारा है देश हमारा,रब करे सदा इसकी कल्याण
देशों में एक देश है विशाल ,है हमारा भारत महान l

ईश्वर एक हैं ,जानते सब हैं, पर मानते हैं अनेक रूप
स्वतंत्र सब,जैसाचाहो वैसा पूजो जिसको पसंद जो रूप
कोई भी हो भाषा भाषी,इस देश में हैं सब एक समान
देशों में एक देश है विशाल ,है हमारा भारत महान l

पंद्रह अगस्त औ छब्बीस जनवरी, हैं गणतंत्र का त्यौहार 
होली ईद क्रिसमस वैशाखी,सब है सद्भावना का त्यौहार
भारत है त्योहारों का देश, त्यौहार फूँकती लोगो में जान
देशों में एक देश है विशाल ,है हमारा भारत महान l


© कालीपद ‘प्रसाद’

Saturday, 8 August 2015

हमारा देश खुशहाल है !*

आगे देखो ,देखते रहो ,अच्च्छे दिन आने वाले हैं
भाषण सुनकर ,गदगद जनता ,दिन बदलने वाले हैं
गिन गिनकर काटते हैं दिन,अच्छे दिन के इन्तेजार में
नींद गायब ,सपने गायब, खुली आँखों में सपने देखते हैं
इस पर भी नारा बुलंद है ,हमारा देश खुशहाल है |

सवा अरब जन में,अस्सी करोड़ गरीब ,गाँव के वासी हैं
गाव में न शिक्षा है ,न रोजगार है न कोई साधन है
कुछ हैं खेतिहार गाँव में,बाकि सब खेतिहार मजदुर हैं
एक बेला खाता है मजदूर ,दूसरा बेला उपवास करता है
इस पर भी नारा बुलंद है ,हमारा देश खुशहाल है |

भरण –पोषण का साधन ,केवल खेतिहांर मजदूरी है
सरकारी आंकड़ा है ,हर व्यक्ति तैंतीस रूपये कमाता है           
पूरा दिन का खर्चा पानी ,इसी से वह पूरा करता है
गाँव वाले भी खुश ,सरकार भी खुश ,मंत्री का कहना है
इस पर भी नारा बुलंद है ,हमारा देश खुशहाल है |

मिटटी के सब घर हैं ,घासफूस,खपरेल का छावनी है
पक्के मकान का सपना,गाँव वालों से अभी कोसों दूर है
आधुनिक साधन? न फोन,न मोबाइल ,न कोई बाहन है
और बात छोडिये,पीने का स्वच्छ पानी का भी अभाव है
इस पर भी नारा बुलंद है ,हमारा भारत महान है |

रहने के लिए न मकान है, न करने के लिए कुछ काम है
पहनने के लिए न कपड़े हैं ,न पेट भरने के भोजन है
इलाज के लिए पैसे नहीं ,रोग से गरीब पीड़ित है
फ़रियाद जितना करो यहाँ ,हाकिम सब बे-दर्द हैं
उसपर भी नारा बुलंद हैं ,भारत हमारा खुशहाल हैं | 

गाँव से गाँव जोड़कर ,बनता गाँव का एक महान देश है
जैसे ईँट से ईँट जोड़कर ,बनता एक मजबूत इमारत है 
हर गाँव जब उन्नत होगा ,तभी कहलायगा देश उन्नत है
तभी होगा सार्थक यह नारा ,हमारा भारत देश महान है

इसके बिना खोखला है सब नारा ,हमारा देश खुशहाल है |

© कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 5 August 2015

भ्रम


भारत में यह भ्रम है ,कि लोग बहुत धार्मिक है

क्या मंदिर ,मस्जिद ,चर्च जानेवाले सब भक्त हैं ?

संत-साधू के प्रवचन में ,भीड़ तो काफी होती है

कुछ ही होंगे सच्चरित्र ,बाकी के चरित्र गायब है |

उपदेशों को कोई नहीं मानता ,न बनते सदाचारी

भ्रष्ट-आचरण, लुट का साधन, बन जाते हैं भ्रष्टाचारी |

उच्च आदर्श की बात करते हैं ,काम उनके नीच है                 

कथनी और करनी में, ज़मीन आसमा का अंतर है |

कौन अच्छा कौन बुरा ,पहचानना मुश्किल है

घर के बाहर सबके चेहरे ,मुखौटा में छुपे है |

खुले बाज़ार का ज़माना है ,अपना ढोल पीट रहे हैं

मार्केटिंग का गुर है ,अपनी तारीफ खुद कर रहे हैं |

अभी-अभी कलम पकड़ा ,खुद को पंडित समझते हैं

गुरु का गुण आया नहीं, खुद को जगत-गुरु मानते है |

भ्रम में जीते, भ्रम में मरते, औरों को भी भ्रमित करते हैं

भ्रम का अँधेरा कब छटेगा, भारत को इसका इंतज़ार है |

© कालीपद ‘प्रसाद’

Monday, 3 August 2015

भ्रम


भारत में यह भ्रम है ,कि लोग बहुत धार्मिक है

क्या मंदिर ,मस्जिद ,चर्च जानेवाले सब भक्त हैं ?

संत-साधू के प्रवचन में ,भीड़ तो काफी होती है

कुछ ही होंगे सच्चरित्र ,बाकी के चरित्र गायब है |

उपदेशों को कोई नहीं मानता ,न बनते सदाचारी

भ्रष्ट-आचरण, लुट का साधन, बन जाते हैं भ्रष्टाचारी |

उच्च आदर्श की बात करते हैं ,काम उनके नीच है                 

कथनी और करनी में, ज़मीन आसमा का अंतर है |

कौन अच्छा कौन बुरा ,पहचानना मुश्किल है

घर के बाहर सबके चेहरे ,मुखौटा में छुपे है |

खुले बाज़ार का ज़माना है ,अपना ढोल पीट रहे हैं

मार्केटिंग का गुर है ,अपनी तारीफ खुद कर रहे हैं |

अभी-अभी कलम पकड़ा ,खुद को पंडित समझते हैं

गुरु का गुण आया नहीं, खुद को जगत-गुरु मानते है |

भ्रम में जीते, भ्रम में मरते, औरों को भी भ्रमित करते हैं

भ्रम का अँधेरा कब छटेगा, भारत को इसका इंतज़ार है |

© कालीपद ‘प्रसाद’

Sunday, 2 August 2015

देश खुशहाल है ? (मुक्तक )*

  • बहुत हैं ऐसे जो ,एक रोटी के लिए तरसते हैं
  • थाली भर लेते हैं कुछ,आधा खाकर छोड़ देते हैं 
  • जिम्मेदार हैं वे खुद, इस देश के अन्न की बर्बादी के
  • नासमझी में बर्बाद कर अन्न,औरों को भूखा रखते हैं |


  • समझदारी से थाली में उतना ले, जितना खा सकते हैं
  • जरुरत पड़ने पर हर भोज्य को, बार बार ले सकते हैं 
  • सोचो जरा उन गरीब लाचार ,निराश्रय लोगो के बारे में
  • देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं ,जो भूखे पेट सोते हैं |


  • केवल खुद के बारे में नहीं, देश के बारे में भी सोचना है
  • देशभक्त, जिम्मेदार नागरिक का,पावन कर्त्तव्य निभाना है
  • अन्न की बरबादी रोकना, है यह सबकी नैतिक जिम्मेदारी  
  • जब सबके थाली में भोजन होगा, देश खुशहाल तब कहना है |



कालीपद 'प्रसाद'
© सर्वाधिकार सुरक्षित


Tuesday, 21 July 2015

दो अजनबी !



चलते चलते अनन्त यात्रा के राह में
एक अजनबी से मुलाक़ात हो गई
कुछ दूर साथ-साथ चले कि
हम दोनों में दोस्ती हो गई |
कहाँ से आई वह ,मैंने नहीं पूछा
मैं कहाँ से आया ,उसने नहीं पूछा
शायद हम दोनों जानते थे
जवाब किसी के पास नहीं था |
अजनबी थे हम मिलने के पहले
अजनबी रहे हम,जब मिलते रहे
अलविदा के बाद भी अजनबी रहेंगे
जैसे अजनबी थे मिलने के पहले |
सफ़र कितनी लम्बी है?न वो जाने न मैं
छोटी सी इस जीवन-सफ़र में
हर कदम पर रही साथी वो मेरा
और उसका हम सफ़र रहा हूँ मैं |    
सुख-दुःख के हर पल को
दिल से लगाकर बनाया अपना
हम दोनों के मिलन का सफ़र
बन गया एक यादगार अफ़साना |


© कालीपद ‘प्रसाद ‘

Tuesday, 7 July 2015

कटु सत्य (मृत्यु शय्या )



यह तो तय था
जिस दिन हम मिले थे
उससे बहुत पहले
यह निश्चित हो गया था
एक दिन हम मिलेंगे और
एक दिन तुम
मुझे छोड़ जाओगी
या मैं तुम्हे छोड़ जाउंगा ,
कौन किसको छोड़ जायगा
यह पता नहीं था l

इस कटु सत्य को
हम जानते थे ,
फिर भी हँसते थे,खेलते थे  
साथ मिलकर
एक दुसरे का
सहारा बनकर आगे कदम बढाते थे l
जीवन के सुख-दुःख के
हर एक पल को
एहसास करने की
कोशिश करते थे ,
कभी लड़ते थे ,झगड़ते थे
फिर मिलकर बतियाते थे ,
पर हमें पता नहीं था
परछाईं की भांति
काल हमारे पीछे खड़े थे l  

कुछ काम इस जनम में
मुझे दिया था ईश्वर ने
साझा करना था तुमसे
किया मैंने, 
जितना बन पड़ा मुझसे l
इंसान गलतियों का पुतला है
गलतियाँ मैंने की
गलतियाँ तुमने की ,
दुखी हूँ मैं                                      
सज़ा केवल तुमको मिली l

इसे सज़ा कहूँ या
अनन्त यात्रा की तैयारी कहूँ ?

एक प्रश्न सदा उठता है मेरे मन में ,
क्या हम साथी रहे किसी और जनम में ?
यदि नहीं......
तो इतना लगाओ क्यों है ?
स्मृति साथ नहीं दे रही है
विछुडने के सोच से
आंसू नही थम रही है l

नहीं पता मुझे
आत्मा होती है या नहीं
अगर होती है ....
तो तुम्हारी भी होगी
उसका भी एक आशियाना होगा *
वादा करता हूँ
मेंरी आत्मा,तुम्हारी आत्मा से
उस आशियाना में मिलेगी l


कालीपद 'प्रसाद '
© सर्वाधिकार सुरक्षित