Sunday, 18 September 2016

दोहे - (हिन्दी)

अर्ज करो भगवान से, वे हैं बड़े महान |
सफ़ल करे हर काम में, सबको देते ज्ञान ||

गए नहीं गर स्कूल तुम, आओ मेरे पास |
उन्नति होगी वुद्धि की, छोडो ना तुम आस ||

वर्णों का परिचय प्रथम, बाकी उसके बाद |
याद करो गिनती सही, होगे तुम आबाद ||

पढ़ो लिखो आगे बढ़ो, करो देश का नाम |
पढ़ लिख कर सब योग्य बन, करना विशेष काम ||

कभी नष्ट विद्या नहीं, होता है तू जान |
अनपढ़ लोगों के लिए, दुर्लभ होता ज्ञान ||

‘अ’ से अजगर ‘क’ से कलम, तनो ’त’ से तलवार |
सरहद पर जो हैं खड़े, कर रिपु का संहार  ||

योद्धा कभी न मानता, रण में अपनी हार

रक्षक हो तुम देश के, हो तुम अग्नि कुमार ||

कालीपद 'प्रसाद'

Saturday, 17 September 2016

कर्मणि अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

कर्मणि अधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन 

भाग इंसान भाग
तेरा भाग्य तभी उठेगा जाग,
सुस्त पड़ा सोता रहेगा
यह जग तेरे आगे निकल जायगा |
यह शरीर मिला है तुझे
इसका कुछ कर्म है
हर अंग का कुछ धर्म है
उसका तू पालन कर |
श्रीकृष्ण ने कहा,
“बिना फल की इच्छा
तू कर्म कर .......”
किन्तु बिना फल की इच्छा,
तेरी कर्म करने की इच्छा जायगी मर |
इसीलिए तू फल की इच्छा कर
और कुछ तो कर्म कर !
जगत में .....
तू है एक विद्यार्थी
सदा एक शिक्षार्थी,
पढ़ना, लिखना, सीखना
फिर हर परीक्षा में पास होना
लेकर प्रभु का नाम
है यही तेरी नियति, तेरा काम |
परीक्षा कक्ष में ...
जब तक कापी कलम
तेरे हाथ में हैं,
सब कुछ तेरे वश में हैं |
जो मन करे, तू लिख
न मन करे, न लिख
पर ध्यान रख
जैसा लिखेगा
वैसा फल मिलेगा...
कापी तूने निरीक्षक को दिया,
तेरे हाथ से सब कुछ निकल गया |
अब सब कुछ परीक्षक के हाथ में है |
जितना अंक देता है,
परीक्षा कक्ष में किये
वही तेरा कर्मफल है |
गलत मत समझ तू
श्रीकृष्ण ने सही कहा है,
तेरा काम परीक्षा देना है
परीक्षक का काम फल देना है;
परीक्षा देने(कर्म) का अधिकार
तेरे पास है,
फल देने का अधिकार
परीक्षक के पास है |
सबको अपने कर्मों का
सही फल मिलता है
“जैसा कर्म करता इंसान
वैसा फल देता भगवान् ” |
© कालीपद ‘प्रसाद’

Wednesday, 14 September 2016

दोहे - आज का लोकतंत्र



प्रजातंत्र के देश में, परिवारों का राज
वंशवाद की चौकड़ी, बन बैठे अधिराज|
वंशवाद की बेल अब, फैली सारा देश
परदेशी हम देश में, लगता है परदेश|
लोकतंत्र को हर लिये, मिलकर नेता लोग
हर पद पर बैठा दिये, अपने अपने लोग|
हिला दिया बुनियाद को, आज़ादी के बाद
अंग्रेज भी किये नहीं, तू सुन अंतर्नाद|
संविधान की आड़ में, करते भ्रष्टाचार
स्वार्थ हेतु नेता सभी, विसरे सब इकरार|
बना कर लोकतंत्र को, खुद की अपनी ढाल
लूट रहे नेता सकल, जनता का सब माल|
हर पद पर परिवार के, सदस्य विराजमान
विनाश क्या होगा कभी, रक्तबीज संतान?
प्रजा करे अब फैसला, करे साफ़ परिवार
जनता से मंत्री बने, मिले राज अधिकार |
© कालीपद ‘प्रसाद’

Monday, 29 August 2016

ग़ज़ल

याँ कुछ लोग जीते भलों के लिए
जिओ जिंदगी दूसरों के लिए |

गुणों की नहीं माँग दुख वास्ते
सकल गुण जरुरी सुखों के लिए |

मैं गर मुस्कुराऊं, तू मुँह मोड़ ले
शिखर क्यूँ चढूं पर्वतों के लिए ?

मैं किस किस की बातें सुनाऊं यहाँ
जले शमअ कोई शमों के लिए |

मकाँ और दुकाने जो भी हैं यहाँ
जवाँ के लिए ना बड़ों के लिए |


© कालीपद ‘प्रसाद’

Monday, 22 August 2016

माँ

                                                                           
माँ

भाव भरा है मातृ दिल, बहता जैसे नीर
देख कष्ट संतान के, माता हुई अधीर

पशु पक्षी इन्सान में, माँ हैं एक समान
सबसे पहले सोचती, बच्चे उनकी जान

चिड़िया चुगती चोंच से, मिला चोंच से चोंच
माँ लाती चुन कर सकल, दाने है आलोच

कभी कहीं खतरा नहीं, जब माँ होती पास 
बच्चे इसको जानते, करते हैं अहसास

धन्य धन्य मायें सभी, धन्य सभी संतान
करती रक्षा प्रेम से, पक्षी या इन्सान

माता है सबसे बड़ी, दूजा हैं भगवान
शीश झुका आशीष लो, कर माँ का सम्मान 

©कालीपद ‘प्रसाद’

Sunday, 21 August 2016

दोहे

  1. मौसम है बरसात का, मच्छर के अनुकूल
  2. डेंगू और मलेरिया , गन्दी नाली-कूल |
  3. मसक भगाने वास्ते, उत्तम पत्ती नीम   
  4. जलाओ इसे शाम को, नीम का गुण असीम 
  5. छत की टंकी साफ़ हो, घर में पहुँचे धूप
  6. बचने दोनों मर्ज से, करो कुछ दौड़–धूप 
  7. राग द्वेष सब दूर हैं, मन जब होता शांत  
  8. मन वश होता योग से, यही योग सिद्धांत |


© कालीपद ‘प्रसाद’

Wednesday, 17 August 2016

आज़ादी कैसे मनाएँ


हम अपनी आज़ादी का जश्न, बोलो अब कैसे मनाएँ
अमर शहीदों के बलिदान की, गाथा किसको सुनाएँ ?

भूखे रहे, गोली खाए वे, लड़ते लड़ते सब शहीद हुए
मजबूत आंग्ल डंडा भी, हौसला वीरों को तोड़ न पाये |
गोरे अंग्रेज तो चले गए, काले अंग्रेज को कौन भगाएँ
हम अपनी...

जालियाँवाला बाग़ को देखा, देखा नोआखाली के दंगे
साजिश थी सब विदेशी राज की, जात के थे वे फिरंगे
दलित-मुस्लिम पर क्रूरता कर, चरम पंथी कैसे इतराएँ
हम अपनी ...

हर चौथा आदमी भूखा है, करोडपति संसद में बैठे है
हर चौथा सांसद पर, भ्रष्टाचार का संगीन आरोप है
निराशा में डूबे देश है , आशा की ज्योति कौन जलाएँ
हम अपनी ...

हर पार्टी है निजी कम्पनी, अध्यक्ष का है मालिकाना हक़
कभी बाप, कभी बेटा, बीबी कभी, खानदान है अधिग्राहक
कम्पनी संभाले या देश संभाले, कौन इनको बतलाएँ
हम अपनी ....

हमारा देश अव्वल है, विश्व के सब देशों की सूचि में
किन्तु खेद है, अव्वल है यह, भ्रष्ट देशों की सूचि में
खेल ना जाने खेल के अध्यक्ष, मशाल कैसे जलाएँ
हम अपनी ...
गरीब को नहीं भरपेट भोजन, सड़ता है सब खाद्यान्न
करोड़ों टन की होती बर्बादी, है यह अकुशल प्रबंधन
भूख और कुपोषण के शिकार, किसके आगे गिढ़गिढ़ायें
हम अपनी ...
© कालीपद ‘प्रसाद’