Thursday, 4 May 2017

ग़ज़ल

आज़ाद हैं यहाँ सभी’ उल्फत ही’ क्यूँ न हो
पावंदी’ भी को’ई नहीं’ तुहमत ही’ क्यूँ न हो |

मिलते सभी गले ही’ अदावत ही’ क्यूँ न हो
दिल से नहीं हबीब मुहब्बत ही’ क्यूँ न हो |

हर देश द्रोही’ जिसने’ किया धोखा’ देश से
गद्दार को सज़ा मिले हिजरत ही’ क्यूँ न हो |

तक़दीर क्या हनोज़ तजुर्बा हुआ नहीं
कुछ तो मिले नसीब, क़यामत ही’ क्यूँ न हो |

फैले हैं हाथ भक्त के’ दृग सामने तेरे
कुछ तो मिले अदीम, हकारत ही’ क्यूँ न हो |

अनुराग यदि पसंद नहीं, बावफा मेरी  
जलवत नसीब में नहीं’, खल्वत ही’ क्यूँ न हो |

गफलत भरा रिवाजें’ सभी दर्दनाक जो
कर त्याग सभी को’ रिवायत ही’ क्यूँ न हो |

कालीपद 'प्रसाद'

5 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 05 मई 2017 को लिंक की गई है............................... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा.... धन्यवाद!

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  2. बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ।

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  3. जीवन की विद्रूपताएं हों या विकृतियाँ कहीं न कहीं वे अपील करती हैं ज़हन से बाहर आने के लिए। प्रेरक रचना।

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  4. जीवन की विद्रूपताएं हों या विकृतियाँ कहीं न कहीं वे अपील करती हैं ज़हन से बाहर आने के लिए। प्रेरक रचना।

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-05-2017) को
    "आहत मन" (चर्चा अंक-2628)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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