Tuesday, 26 March 2019

ग़ज़ल

सताकर हमें तुम रुलाना नहीं
जलाकर अगन अब बुझाना नहीं|
किया है मुहब्बत तुम्ही से सनम
वफा चाहता हूँ भुलाना नहीं |
नजर से नजर को मिलाकर कभी
कसम ली, नजर अब चुराना नहीं |
लुकाते छुपाते यहां तुम मिले
मिले तो सही पर ठिकाना नहीं |
मुहब्बत करूं तो बताना बुरा
करूं क्या कहो तुम, छिपाना नहीं |
मिलन के दिनों की’ यादें बची
निशाने अभी तुम मिटाना नहीं |
मिलेंगे कभी फिर यही आस है
ये' अरमान दीपक बुझाना नहीं |
कालीपद 'प्रसाद'

6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (27-03-2019) को "अपनी औकात हमको बताते रहे" (चर्चा अंक-3287) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सादर आभार आपका आ डॉ रूपचंद्र शास्त्री जी

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  3. saral lafzon men bahut sundar ghazal.
    Slashdot, Scmp, Flickr & Rutgers

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