Sunday, 31 March 2019

ग़ज़ल

शिक्षा  नसीब होती, कहना जरूर आता
गर  धूर्तता  भीहोती, छलना जरूर आता |

इस देश के सभी नेता झूठ पर टिके हैं
गर देश प्रेम होता, हटना जरूर आता |

प्रासाद के लिए नेता झोपड़ी जलाते
निस्वार्थ रहनुमा को जलना जरूर आता |

गर  जिंदगी मेंसुख का सूरज कभी उग आता
तो फिर कभी कभी तो हँसना जरूर आता |
आजन्म जोखिमों से हम खेलते रहे हैं
होते अगर मुलायम डरना जरूर आता |

गर चाहते सभी नेता जात पात से मुक्ति
तब फिर समाज को भी ढलना जरूर आता |

कालीपद 'प्रसाद'

8 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (01-04-2019) को "वो फर्स्ट अप्रैल" (चर्चा अंक-3292) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. शुक्रिया आ डॉ रूपचंद्र शास्त्री जी

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  2. बहुत सुंदर ग़ज़ल।
    नयी पोस्ट :intzaar और आचार संहिता।
    iwillrocknow.com

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    1. शुक्रिया नितीश तिवारी जी

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  3. सुंदर गज़ल

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