मेरे विचार और अनुभुतियों की गुलिस्ताँ में आपका स्वागत है |.... ना छंदों का ज्ञान,न गीत, न ग़ज़ल लिखता हूँ ....दिल-आकाश-उपज,अभ्रों को शब्द देता हूँ ........................................................................ ............. इसे जो सुन सके निपुण वो हैं प्रवुद्ध ज्ञानी...... विनम्र हो झुककर उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ |
Tuesday, 9 December 2014
Thursday, 4 December 2014
ऐ भौंरें ! सूनो !
ऐ भौंरें ! सूनो , बाग़ की शान्ति न तुम तोड़ो
स्वागत है तुम्हारा, फूलों से नेह-नाता जोड़ो||
कलियाँ तो कल का फूल है, कलिओं को ना छेड़ो
फूल बनकर सौरभ बिखरेगी ,फूलों को ना तोड़ो |
यौवन का सौरभ क्षणिक है ,यौवन नहीं ,फूल से प्यार करो
धन्य करो फूलों का जीवन ,डूबकर प्यार में मधु पान करो |
गुन गुनाकर झूमते हो , आकर्षित हो खिले फूलों की ओर
नज़र उठाकर नहीं देखते ,कल के मुरझाये फूलों की ओर |
मुरझाये फूलों के भी कुछ अरमान है ,उसका तो ख्याल करो
झड जायगा यह फूल एकदिन ,जानकर उसका अनादर ना करो |
जीवन सबका क्षणिक है , इस बात को ना भुला करो
प्रेम का विनिमय ही शाश्वत है ,इसपर मन स्थिर करो |
कालीपद "प्रसाद "
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Wednesday, 19 November 2014
आईना !*
कभी किसी से कुछ नहीं कहता आईना
चुप रहकर भी सबकुछ कह देता
है आईना !
बुरा हो या अच्छा हो ,सूरत
या सीरत
उसका हुबहू तस्वीर दिखा
देता है आईना !
आईना से कभी नहीं छुपता है
कोई झूठ
चेहरे की रंगत देख,तस्वीर खींच
देता है आईना !
गिरगिट सा हरघडी,कितना भी
रंग बदले मन
चेहरे पर हर रंग का अक्स
देख लेता है आईना !
भ्रम के चौराहे,भटकता मन देखता
है जब आईना
मन को सही रास्ता दिखा देता
है आईना |
घबराओ नहीं “प्रसाद” गर दिल
तुम्हारा सच्चा है
तस्वीर भी खुबसूरत दिखा
देता है आईना !
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कालीपद “प्रसाद”
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Tuesday, 11 November 2014
प्रेम !*
किताबें बहुत पढ़ी, हासिल की
अनेक डिग्रियां
ढाई अक्षर प्रेम का अर्थ
क्या है, समझ नहीं पाया |
कसमें बहुत खाई ,वादे बहुत
किया ( ख़्वाब में )
ख्वाब टूटी,सब भूल गए,वादा
निभा नहीं पाया !
तुझे ढूंढ़ता रहा, कभी यहाँ
कभी वहाँ
दुनियाँ भूल भुलैया है
,तुझे ढूंढ़ नही पाया !
भ्रमित हूँ ,भटकता हूँ पागल
की तरह
हर चीज़ में तुम्हे
नहीं,तुम्हारी अक्स पाया,!
आँखों में अश्क की कमी है “प्रसाद “
अश्क-बारी भी नसीब नहीं हो
पाया !
कालीपद "प्रसाद"
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Saturday, 8 November 2014
एक दिन तुम मेरी दुल्हन बनोगी !**
तमन्ना है दीदार करूँ,
मुस्कुराता चेहरा तेरा
देख तनी भृकुटी तेरी, है होश उड़ जाता मेरा |
गर थोडा हँसकर बोल दे,क्या
बिगड़ेगा तेरा ?
बहार आएगी ,गुल चमन
में खिलेगा मेरा !
नकली ही सही,दो लफ्ज मीठे
बोलकर देखो
तुम पर जिंदगी कुर्बान, यह है वादा मेरा !
एकबार हाथ, मेरे हाथ में
देकर तो देखो
नहीं छूटेगा जिंदगी भर ,यह है वादा मेरा !
छोड़ संकोच,नाराजगी तुम, कदम
बढ़ा के देखो
यकीं है तुम मेरी दुल्हन
बनोगी, विश्वास सदा मेरा |
कालीपद "प्रसाद"
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Sunday, 2 November 2014
तुझे मना लूँ प्यार से !**
चाहता हूँ ,तुझे मना लूँ
प्यार से
लेकिन डर लगता है तेरी
गुस्से से !
घर मेरा तारिक के आगोश में
है
रोशन हो जायगा तेरी बर्के-हुस्न
से !
इन्तजार रहेगा तेरा क़यामत तक
नहीं डर कोई गमे–फ़िराक से !
मालुम है कुल्फ़ते बे-शुमार
हैं रस्ते में
इश्क–ए–आतिश काटेगा वक्त
इज़्तिराब से !
हुस्न तेरी बना दिया है
मुझे बे-जुबान
बताऊंगा सब कुछ ,तश्ना–ए–तकरीर
से |
शब्दार्थ : तारिक=अन्धकार
,अँधेरा ; बर्के हुस्न=बिजली जैसी चमकीला सौन्दौर्य : गमे –फ़िराक=विरह का दुःख : इश्क
–ए –आतिश =प्यार का आग : इज़्तिराब से=व्याकुलता से : तश्ना –ए – तकरीर=प्यासे
होंठो से
कालीपद "प्रसाद "
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