Saturday, 11 October 2014

साजन नखलिस्तान **

कैसा साँचा बनाया तूने ,मेरे मन के आंगन में
कोई भी मूरत समाता नहीं ,मन के इस सांचे में |

चाहत का कौन सा रंग चुना ,न जानू ,तू ने
कोई भी रंग फबता नहीं , मन के इस मूरत में |

ढूंढा  उसको नगर नगर ,छूटा न कोई शहर
कहाँ मिलेगा साजन मेरा ,मैं हूँ उसके इन्तजार में |

बदल दो इस साँचे को रब , या बना दो कोई मूरत
साँचा मूरत एक हो जाय ,एक रंग चढ़ जाय दोनों में |

सूरत ,सीरत ,रंग ,रूप सब भर दो एक मूरत में
नापतौल में व्यावधान न हो ,समागम हो मेरे सांचे में |

साजन है पानी ,बिन पानी नहीं कटता जीवन
साजन है नख्लिस्तान*, जीवन के रेगिस्तान में |        

   *नख्लिस्तान -oasis -मरुभूमि  में  जहाँ पानी मिलता है


कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित

11 comments:

  1. सभी मित्र परिवारों को आज संकष्टी पर्व की वधाई ! सुन्दर प्रस्तुतीक्र्ण !

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  2. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 13/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  3. सुन्दर भावाभिव्यक्ति...

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  4. वाह सर जी क्या बात ..कमाल की रचना :)


    मेरे ब्लॉग पर आप आमंत्रित  हैं :)

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  5. बेहद खुबसूरत अभिव्यक्ति ..... उम्दा गजल

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  6. बहुत खूब ... हर शेर लाजवाब ...

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  7. बहुत बढ़िया और मन को छूती गजल ---
    सादर

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