Friday, 17 October 2014

इश्क उसने किया .....**

इश्क उसने किया,सन्देश मुझे मिला
इश्क मैं ने किया सन्देश उन्हें न मिला !

वो खमोश थी ,उन्हें तारीफ़ मिली
मैंने इज़हार किया ,मुझे दुत्कार मिला |

निगाहों निगाहों में पैगाम भेजती थी वो
पैगाम को पढना चाहा ,निगाह का ताड़न मिला .

शोख़ अदाओं की मलिका है वह ,नाजुक ,कमसिन है
तारीफ़ के कसीदे पढ़े हमने ,कोई इनाम न मिला |

नाज़ुक दिल है उनका ,कमल सा कोमल बदन है 
सुना था मैंने भी ,सबुत कोई न मिला |

सुरमा लगी आँखें ,लाल जादुई पिया का लब
भेजा था न्योता उसने ही ,पता नहीं किसको मिला |

इश्क में तड़पना ,धोखा खाना आम बात है 
खुश नशीब हो "प्रसाद "उनसे इनकार तो न  मिला |


कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित

14 comments:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 18 अक्टूबर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपका आभार यशोदा जी !

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (18-10-2014) को आदमी की तरह (चर्चा मंच 1770) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. अपरिहार्य कार्य के कारण ब्लॉग पर नियमित रूप से नहीं आ पा रहा हूँ | विलम्ब के लिए खेद है !आपका आभार डॉ रुपचद्र शास्त्री जी!

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  4. बेहतरीन रचना

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  5. सुन्दर विचार कणिका ,भाव और अर्थ .

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  6. वाह ... हकीकत की जुबानी हैं ये शेर ...

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  7. बहुत ही बढ़िया

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  8. सुन्दर रचना! काली प्रसाद जी!

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  9. बहुत बढ़िया ! बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति !

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