Thursday, 25 September 2014

शुम्भ निशुम्भ बध -भाग ३

भाग २ से आगे

माँ चंद्रघंटा

आप सबको शारदीय नवरात्रि ,दुर्गापूजा एवं दशहरा का अग्रिम शुभकामनाएं ! गत वर्ष इसी समय मैंने महिषासुर बध की  कहानी को जापानी विधा हाइकु में पेश किया था जिसे आपने पसंद किया और सराहा | उससे प्रोत्साहित होकर मैंने इस वर्ष "शुम्भ -निशुम्भ बध" की कहानी को जापानी विधा "तांका " में प्रस्तुत कर रहा हूँ | इसमें २०१ तांका पद हैं ! दशहरा तक प्रतिदिन 20/२१ तांका प्रस्तुत करूँगा |आशा है आपको पसंद आयगा |नवरात्रि में माँ का आख्यान का पाठ भी हो जायगा !


      45
शुम्भ अथवा
पराक्रमी निशुम्भ
स्वयं पधारे
जीतकर मुझको
मुझसे व्याह करे |
        ४६
दूत ने कहा
देवी तुम दम्भ में
बात न करो
कौन ऐसा पुरुष
जीते शुम्भ निशुम्भ ?
       ४६
छोडो घमंड
भीडो न शुम्भ संग
हारोगी जंग
तुम अकेली नारी
कैसे तुम लड़ोगी ?
      ४७
देव दानव
युद्ध में सब हारे
विजयी शुम्भ
तुम नारी होकर
कैसे करोगी युद्ध ?
       ४८
कहता हूँ मैं
शुम्भ की आज्ञा मान
रक्ष अपना
मान और सम्मान
मान शुम्भ को पति |
       ४९
हारने पर
जाओगी चलकर
खोकर मान
पकड़ेंगे केश वे
घसीटेंगे रास्ते में |
        50
कहा देवी ने
शुम्भ पराक्रमी है
कहो उनसे
नहीं तोड़ सकती
डरकर प्रतिज्ञा |
        ५१
शुम्भ निशुम्भ
विजयी दैत्य द्वय
करे निर्णय
करे वही जो सही
उचित जान पड़े |

धूम्रलोचन बध !

         ५२
निराश दूत
सुन देवी कथन
क्रोध में आया
दैत्यराज को सब
विस्तार से बताया |
        ५३
कुपित हुआ
वचन सुनकर
शुम्भ असुरा
दैत्य सेनापति को
तुरंत बुलवाया
       ५४
धूम्रलोचन
सेनापति हाज़िर
शुम्भ ने कहा
अपनी सेना साथ
युद्ध में जाओ तुम |
         ५५
दुष्टा के केश
पकड़कर तुम
 लेकर आओ
बलपूर्वक उसे
घसीटकर लाओ |
         ५६
शुम्भ की आज्ञा
धूम्रलोचन दैत्य
पाकर चले
साठ हज़ार सेना
साथ लेकर चले |
       ५७
देवी थीं जहाँ
पहुंचकर वहाँ
कहा देवी को...
नारी ! तू अहंकारी !
ललकारा देवी को |
          ५८
स्वेच्छा से तुम
प्रसन्नता पूर्वक
मेरे मालिक
शुम्भ निशुम्भ पास
चलो स्वामी समीप |
          ५९
इन्कार पर
झोंटा पकड़कर
मैं ले जाऊँगा
बुद्धिमती नारी हो
वक्त समझती हो |
     60    
देवी ने कहा
दैत्य के सम्राट ने
तुम्हे भेजा है
स्वयं हो बलवान
सोचो कुछ निदान |
       ६१
तुम्हारे साथ
सेना भी है विशाल
मेरा क्या बस ?
क्या कर सकती हूँ ?
घसीटो बल पूर्वक |
        62
धूम्रलोचन
सुन देवी वचन
क्रोधित हुआ
दौड़ा उनकी ओर
देवी हुंकार किया ....
       ६३
देवी को देख
धूम्रलोचन दैत्य
हुंकार भरा
क्रोधित देवी दृष्टि
दैत्य को भष्म किया |

नवरात्रि और दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनाएं
क्रमश:

कालीपद "प्रसाद "
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Wednesday, 24 September 2014

शम्भू -निशम्भु बध भाग २

भाग १ से आगे 

 
माँ ब्रह्मचारिणी



    २४    
इसके बाद
भृत्त शम्भू निशम्भु
चंड-मुंड ने
देखा मन मोहिनी
देवी अम्बिका रूप|
         25
सुचना दिया
शुम्भ ओ निशुम्भ को
रूपसी देवी
स्थित है पर्वत में
महारानी के योग्य |
        २६
मोहिनी रूप
किसीने नहीं देखा
असुरेश्वर
स्त्रियों में वह श्रेष्ट
है वह कुलश्रेष्ट |
        २७
अंग सुन्दर
बहुत ही सुन्दर
अंग प्रत्यंग
श्री अंगों के प्रभा से
प्रकाशित दिशाएँ |
        २८
असुरेश्वर !
कौन देवी है वह ?
जान लीजिये
हिमालय पर ही
बैठी है वह अभी |
        २९
हे दैत्यराज !
लोकों में हाथी  घोड़े
है जो आपके
मणि रत्न जितने
शोभा पाते घर में ....
       30
सब तुच्छ हैं ,
रमणी के रूप में
वह हीरा है
आपकी महारानी
बनने सुयोग्य हैं |
       31
स्त्रियों में रत्न
कल्याणमयी देवी
अपूर्व आभा
होगी दैत्यों की रानी
करते  हैं  विनती |
         ३२
चंड -मुंड का
सुनकर वचन
 शुम्भ ने दूत 
असुर सुग्रीव को
भेजा देवी के पास |
        ३३
शुम्भ ने कहा
तुम मेरी आज्ञा का
करो पालन
समझाना देवी को
शीघ्र करो गमन |
       ३४
दूत पहुँचा
जहाँ देवी मौजूद
विनम्रता से
वाणी में कोमलता
मधुर वचन से ...
       ३५
प्रार्थना किया ...
"तोनो लोकों के राजा
शुम्भ दैत्य का
सन्देश सुनो देवी
मैं हूँ दूत सुग्रीव |
      ३६
उनकी आज्ञा
मानते है देवता
त्रिलोकेश्वर
यज्ञों भागो को वह
भोगता है अकेला |
         ३७
 लोकों में श्रेष्ट
स्वर्ग मर्त्य पातळ
अजेय राजा
देवराज इन्द्र का
राजत्व छीन लिया|
       ३८
देव गंघर्व
सबके रत्न  आदि
शुम्भ निशुम्भ
जित लिया सबको
हराकर युद्ध में |
        ३९
महा संग्राम
किया दैत्य द्वय ने
देवताओं से
स्वर्ग को भी जीता है
हराकर देवों को |
       ४०
मृग नयनी !
सारी स्त्रियों में मणि
हे कोमोलांगी!
मेरी ये बातें सुनो
भजो शुम्भ निसुम्भ !"
       ४१
दूत मुख से
परक्रामी शुम्भ के
सुन सन्देश ,
मुस्कुराकर देवी
मीठी वचन बोली |
       ४२
दूत सुग्रीव
सत्य कहा तुम ने
मिथ्या नहीं है |
शुम्भ लोकों का स्वामी
निशुम्भ पराक्रमी |
       ४३
बुद्धि हीन मैं
प्रतिज्ञा बद्ध हूँ मैं
तोडूँगी कैसे ?
जो वीर संग्राम में
हरा देगा मुझको .....
         ४४
निश्चित जानो
मेरा स्वामी होगा वो
अल्प वुद्धि मैं
नहीं तोड़ सकती
यह प्रतिज्ञा मेरी |


क्रमश:

कालीपद "प्रसाद"
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Tuesday, 23 September 2014

शम्भू -निशम्भु बध --भाग १

प्रिय मित्रों !
आप सबको शारदीय नवरात्री ,दुर्गापूजा एवं दशहरा का अग्रिम शुभकामनाएं ! गत वर्ष इसी समय मैंने महिषासुर बध की  कहानी को जापानी विधा हाइकु में पेश किया था जिसे आपने पसंद किया और सराहा | उससे प्रोत्साहित होकर मैंने इस वर्ष "शुम्भ -निशुम्भ बध" की कहानी को जापानी विधा "तांका " में प्रस्तुत करने जा रहा हूँ | इसमें २०१ तांका पद हैं ! दशहरा तक प्रतिदिन 20/२१ तांका प्रस्तुत करूँगा |आशा है आपको पसंद आयगा |नवरात्री में माँ का आख्यान का पाठ भी हो जायगा !


                                                                            
                                                                                



                                                        वन्दना !
    १.
शारदा देवी
विद्या बुद्धि दायिनी
त्वं सरस्वती
पुन: पुन: नमामि
अर्पित पुष्पांजलि |
          २.
चन्द्र रूपिणी
सुख शांति दायिनी
शुभ्र वरन
जगत जननी को
सतत नमस्कार |
         ३.
राज लक्ष्मी को
शर्वाणी स्वरुपा  को
अत्यंत सौम्य
अत्यंत रौद्ररूपा
देवी को प्रणमामि|
        ४.
सरस्वती ही 
महा लक्ष्मी रूपिणी
दुर्गा रूपा को
रक्तबीज हारिणी
नमामि महाकाली |
          ५.
चन्द्र किरण
सम ज्योति,कान्ति है ,
शुम्भ -निशुम्भ
घातिनी दुर्गामा को
सतत नमन है |
          ६.
दुःख नाशिनी
शुम्भ आदि दैत्यों का
कर संहार
देवराज इन्द्र का
किया स्वर्ग उद्धार |
        7.
नमामि त्वम्
बहु रूप धारिणी
कष्ट हारिणी
हरना मेरी  बाधा
कहूँ तुम्हारी कथा |
************

कथा  !  

     ८.
आदि काल में
शुम्भ ओ निशुम्भ ने
इन्द्रदेव से
छिन लिया  स्वर्ग को
और यज्ञभाग को |
        ९.
सूर्य चन्द्रमा
कुबेर यम और
वरुण का  भी
अधिकार सबका
दोनों दत्यों ने छिना |
         10.
वायु अग्नि को
सब देवताओं  को
पराजित हो
अधिकार हीन हो
स्वर्ग से जाना पड़ा |
         ११.
जगदम्बा ने
दिया था वरदान
देवताओं को
आपद विपद में
करेंगी रक्षा उन्हें |
        १२.
दोनों दैत्यों से
तिरस्कृत देवता
दुर्गा देवी के
शरण में पहुंचे
दुःख के नाश हेतु |
       १३.
पहुंच कर
गिरि हिमालय में
कर बद्ध हो
जगदम्बा माता की
स्तुति करने लगे |
       14.
हे दुर्गापारा
सारा सर्व कारिणी
सुख स्वरुपा
जगत का  आधार
कोटिश: नमस्कार |
       १५.
विष्णुमाया के
नाम से प्रचलित
सब प्राणी में
प्रतिष्ठित जग में
तुमको नमस्कार |
        १६.
हम सब की
वुद्धि ,शक्ति ,कान्ति हो
लज्जा रक्षक
राजलक्ष्मी श्रद्धा हो
क्षमाशील माता हो |
         १७.
करुणामयी
रक्ष हे दयामयी
देवताओं को
शुम्भ निशुम्भ दैत्य
पराजित देवों को |
        18.
कल्याण मयी
जग मंगल कारी
हे जगदम्बा
हम है स्वर्ग हीन
देवलोक स्वर्ग से |
         १९.
भगाए हुए
उद्दंड असुरों से
शरणागत
हमसब देवता
संकट दूर करो |
        20.
पार्वती देवी
गंगा स्नान के लिए
गंगा पहुंची,
सुन देवता स्तुति
भगवती ने पूछा |
         २१.
किसकी स्तुति
देवगण करते
बताओ मुझे ,
उन्ही के शरीर से
शरीर कोष जन्मी
        २२
नाम कौशिकी
बोली भगवती से
देवता गण
पराजित होकर
शुम्भ ओ निशुम्भ से ...
       २३
मेरी ही स्तुति
गा रहे हैं देवता
एकत्रित हो ,
होकर मैं प्रसन्न
दुःख दूर करुँगी |


क्रमशः....

कालीपद "प्रसाद "
सर्वाधिकार सुरक्षित




Friday, 12 September 2014

दिल की बातें ***






वे ज़ख्म देते हैं  ,मैं  मुस्कुराता हूँ 
वे खुश होते हैं ,मैं रिश्ता निभाता हूँ |
सभी रिस्ते गए थे टूट बहुत पहले 
रिवाजों का ही" ढोए बोझ जाता हूँ |
मुसीबत में लोग गधे को बाप कहते है 
इसी उम्मीद से गधे की जिंदगी जी रहा हूँ |
किस्मत कहते हैं किसको ,मुझे नहीं पता
मैं तो अपना कर्म का फल भोग रहा हूँ |
शब्द के अथाह सागर में गोता लगाता हूँ
मन पाखी को भाता है शब्द वही कहता हूँ | 
पूजता हूँ ईश्वर ,अल्लाह ,पाने उनके 'प्रसाद '
आजतक किसने पाया ,उसको ही ढूंढ़ रहा हूँ | 


(c) कालीपद "प्रसाद "

Wednesday, 10 September 2014

रब का इशारा **


                                    
चित्र गूगल से साभार


पहले केदार नाथ में प्रलय ,अब काश्मीर में प्रलय
चेत जाओ इंसान ,अब संभालो पर्वतराज हिमालय !

ईश्वर नाराज़ है या प्रकृति ने दिया यह निर्मम दण्ड
बीते वर्ष में भी आई थी यह देव भूमि उत्ताराखंड !

सिन्धु तट जलमग्न होता  है ,तीव्र समुद्री तूफान से
हिमालय पर प्रलय आ रहा है ,क्या दैवीय प्रकोप से ?

सोचो इंसान करो कुछ  उपाय, बंद करो अब शोषण
अत्याचार का करो अंत ,बंद करो धरती का दोहन !

शायद यह है सुप्त संकेत ,भविश्य के बड़े आपदा का
जलमग्न होगा पूरा देश ,काम ना आयगा कोई प्रार्थना !

पाक काश्मीर ,हिन्द काश्मीर ,समझो रब का इशारा 
सबसे है नाराज़ रब ,उसने न माना कोई सीमा रेखा !

डूब गया पूरा काश्मीर ,मरे न जाने कितना इंसान 
कोई न जाने पीड़ित में कौन हिन्दू ,कौन मुसलमान !

(C)   कालीपद "प्रसाद "



Friday, 5 September 2014

गुरु कैसा हो !


शिक्षक दिवस पर आप सबको हार्दिक शुभकामनाएं !


गुणगान तो होती है
गुरु की महिमा पर ,
उनकी उदारता ,ज्ञान गंभीर 
सहानुभूति और असीम प्यार पर |

गुरु का ह्रदय संकुचित न हो 
जिसमें धनी निर्धन में फर्क न हो
जात पात का भेद भाव ना करे आचार्य 
एकलव्य के साथ जैसा किया था द्रोणाचार्य |

कुम्हार वही है जो 
गीली मिट्टी को प्रयोज्य आकार दे ,
शिक्षक वही है जो 
निर्मल ह्रदय से 
बच्चों के निर्मल ह्रदय पर 
सार्थक चित्र खींच दें ,
इमानदारी से 
सफल जीवन यात्रा का
 रहस्य बता दें 
खुद आगे चलकर 
पगडण्डी का नींव डाल दें |

परिवर्तन के इस युग में 
विश्वबाजार के दौर में 
आजीविका का प्रश्न भी है !
समाज ,सरकार केवल 
गुरु से अपेक्षाएं न करे 
उनकी वाजिब 
आवश्यकताओं की पूर्ति करें |
ईमानदार होगा तब भारत 
भ्रष्टाचार से होगा मुक्त 
गुरु होगा पूज्य हर घर में 
भारत होगा पूज्य फिर विश्व में |

कालीपद "प्रसाद"
सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, 2 September 2014

गुस्सा

गुस्सा  न तो दीमक है 
न वह शीत ज्वर है ,
यह तो सैलाब है .........
जो तोड़ देता है वुद्धि का बांध 
उखाड़ देता है विवेक का जड़ 
मनुष्य को बना देता है हिंस्र पशु 
तोड देता है रिश्ते नाते का बंधन सारे 
सब को कर देता  है निमग्न 
बाड  से जैसे नदी के दो किनारे |

मुँह बन जाता है अक्षय तरकश 
निकलता है तीक्ष्ण शब्द वाण 
भेदता है विपक्ष के ह्रदय पटल 
लेने को आतुर उसका प्राण 
किन्तु जब थमता है गुस्सा का ज्वर 
मुँह से निकले शब्द वाण  का 
सोच नहीं पाता  है कोई उत्तर 
पश्चाताप का आंसू चाहे भर दे नदी सारे 
नहीं भर पाता है जो घाव दिए हैं गहरे |

कालीपद "प्रसाद "
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