Saturday, 2 November 2019

ग़ज़ल


२१२२  १२१२  १२२
सोच में दोष, शर्मसार है दिल
दोष को काटता, कटार है दिल |

प्यार में प्यार ही दिया तुझे मैं
हिज्र में फ़क्त गम गुसार है दिल |

प्यार को यदि कभी मना किया है
तो हसीनों ! गुनाहगार है दिल |

जब कभी प्यार में हुई कमी तो
दीख जाता कि बेकरार है दिल |

लो ! मुहब्बत नहीं है नसीब में
क्या कहूँ यार दागदार है दिल |

इश्क करना गुनाह हो गया है
गल्त फहमी का अब शिकार है दिल |

और ऊपर उछालो’, गेंद है यह 
अब समझ लो लिया उधार है दिल |

धोखा’ खाया हुआ शिकस्त ‘काली’
बन गया खूब होशियार है दिल |

कालीपद 'प्रसाद'

Friday, 1 November 2019

गीतिका



जिंदगी जो जी रहा हूँ वह मेरा आज है
कर्म जो करता हूँ उसी पर बेशक नाज़ है |

जनता भोली भाली बेचारी गाय समान
रहनुमा बने ये आदम सब सट्टेबाज़ है  |

परिवर्तन प्रकृति का नियम, प्रगति का मूल वजह
बदली है रीति-रिवाज़, बदला यह समाज है |

सूर्य देता रश्मि, कवि फैलाता अक्षय ज्योति
सूर्य, शायर नहीं तारीफ के मोहताज़ है |

आज लिख रहा हूँ, आज शायद कोई न पढ़े
एक न एक दिन होगा पढने का आगाज़ है |

कविता, मुक्तक ग़ज़ल, गीतिका, दोहे छंद सब
लिखे सभी दिल से हम, उसीपर बहुत नाज़ है |

आयगा एक दिन जब इनको कोई पढेगा
उनको मज़ा आयगा ‘काली’ को अंदाज़ है |

कालीपद 'प्रसाद'


Sunday, 27 October 2019

गीत


गीत –दिवाली मात्रा (१०,१६)


दीपों का उत्सव, घर घर झिलमिल अब दीप जले
इस दिवाली में, एक दीप झोपडी में जले |

कोने कोने में, महलों के, फ़ैल गया प्रकाश
धनी रहनुमा के, घरों में है, लक्ष्मी का बास |
जगमगाते महल पास, अँधेरी झोंपड़ी मिले  
इस दिवाली में, एक दीप झोंपडी में जले |

नया वस्त्र आवृत, नया आभूषण तनपर सजे
घर आँगन मंडप, में हर कोई लक्षी पूजे
माँ लक्ष्मी तुम अब, महल से उतर अहले–गहले
झुग्गी में आओ, एक दीप झोंपड़ी में जले | 

अभागा देश के, स्वार्थी आकाओं धीर धरो
गरीब ने तुमको चुनकर भेजा, कुछ भला करो
भूखे हैं सब, यहाँ सबके सब हैं दिल जले
इस दिवाली में, एक दीप झोपडी में जले |

कालीपद 'प्रसाद'






Saturday, 26 October 2019

ग़ज़ल


२१२२ १२१२ २२ (११२)
जीत पर मित्र वाह वाह न की
तोहफे पर अदू ने’ डाह न की |
मुश्किलों से नजात चाह न की
जीस्त में कोई’ भी गुनाह न की |
छोड़ने का वो’ फैसला उसका
खुद ब खुद सब किया, सलाह न की |
प्यार तो था नहीं कभी मुझसे
उसने’ अच्छा किया निबाह न की |
बेवफा तो नहीं, न विश्वासी
पहले उसने कभी अगाह न की |
जल प्रदूषित कभी न हो. गर
गंगा’ में शव कभी प्रवाह न की |
भौंरे’ संसार में बहुत ‘काली’
जिंदगी में कभी विवाह न की |
कालीपद 'प्रसाद'

Friday, 25 October 2019

ग़ज़ल

२१२२/११२२ ११२२ ११२२ २२
प्यार जिसको मिला’ खुश्बख्त बड़ा होता है
जिसे’ दुत्कार मिला दिल का’ जला होता है |
जीस्त जिसने दिया’ वो कष्ट दिया जीवन में
और कोई नहीं बस जंद खुदा होता है |
आपसे क्या कहूँ’ बर्बाद किया जीवन को
बेवफा प्यार भी’ दर्दीला’ क़ज़ा होता है |
जिंदगी में जिन्हें’ सुख ही मिला’,सब है कच्चे
शुद्ध सोना सदा’ तपकर ही’ खरा होता है |
रहनुमा हो या’ सनम वादे’ किया करते हैं
सभी वादे न निभाये तो’ दगा होता है |
काम जनता के‘ बहाने किया’ करते नेता
पर दिलों में स्वयं का स्वार्थ छुपा होता है |
और क्या क्या छुपा रक्खा है ? बताओ ‘काली’
राज है जो छुपा, जनता को’ पता होता है |
शब्दार्थ =
खुश्बख्त= भाग्यशाली
जंद = महान
क़ज़ा =आँख में पड़ा कचडा, मौत
कालीपद 'प्रसाद

Saturday, 18 May 2019

ग़ज़ल


जिंदगी तो  बेवफा है क्या करें
दंड तो हमको मिला है क्या करें ?

छोड़ कर जब से गई लौटी नहीं
दिल के कोने दुख छुपा है क्या करें ?

जानते हैं झूठ कहते  रहनुमा
सब करारें खोखला है, क्या करें ?

कुछ कहे तो कोर्ट जाते हैं जनाब
बंद मुँह जीना कजा है  क्या करें ?

खो गई है जिंदगी की आस भी
आसरा भी ना बचा  है क्या करें ?

जिंदगीकालीमिली थी मुफ्त मे
मुफ्त में सब दुख मिला है क्या करें ?
 
कालीपद 'प्रसाद'

Wednesday, 8 May 2019

ग़ज़ल

२१२२  २१२२  २१२२  २१२
सब तन्हा इस धरा पर, संग जाता कौन है ?
कौन जाने स्वर्ग से भी साथ आया कौन है ?

खोज में है संत साधू किस धरा पर स्वर्ग है
भाँग पीते हाथ मलते स्वर्ग पाया कौन है ?

सार सब ग्रंथों का’ इक ईश्वर नहीं है दूसरा
किन्तु दावा कौन करता, धर्म अच्छा कौन है ?

धर्म में विद्वेष है, हर मज़हबी का दावा’ है
धर्म उसका श्रेष्ट है पर,श्रेष्ट सच्चा कौन है ?

एक है बाज़ार यह संसार, बिकता सब यहाँ
अब पता करना ज़रा, ईमान बेचा कौन है ?

न्याय या अन्याय, सब कुछ चल रहा है आज तक
फ़क्त सबसे न्याय हो, अब न्याय सोचा कौन है ?

जो मिले खाओ, कभी नखरे न ‘काली’ तुम करो
मुफलिसों में दूध रबड़ी, नित्य खाता कौन है ?

कालीपद 'प्रसाद'